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माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्भया काण्ड के दोषियों को फांसी की सजा सुनाते ही जनता ने इस पर अपना समर्थन प्रकट करते हुए जीत की खुशी जैसा इजहार किया है. कई अखबार में लोगों द्वारा जश्न मनाने की खबर भी छपी. मुझे भी इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल होने का आमंत्रण मिला था. लेकिन मेरे मन में इस विषय पर कुछ सवाल उठ रहे हैं, मुझे लगा की क्या मैं पुरुष हूँ इसलिए यह सवाल उठ रहें हैं. निर्भया काण्ड के बाद पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए अन्य कई शहरों की तरह पटना में भी कई समूहों ने सड़क पर जुलूस निकाले थे. उस समय मेरी पत्नी नीलू भी एक टीम का नेतृत्व कर रही थीं. रैली में बड़ी संख्या में लड़के-लड़कियां शामिल हुए थे. इस दौरान हम सभी साथी पटना के सड़क पर नारा लगा रहे थे- ‘मेरा शरीर मेरा अधिकार’,‘वी वांट जस्टिस’, ‘सुरक्षा नहीं करने वाली सरकार निकम्मी है’. इस बीच न्याय प्रक्रिया में पांचवर्ष लग गए, केंद्र में सरकार बदल गई और उच्चतम न्यायालय के कई न्यायधीश भी बदल गए. हालांकि इस घटना के बाद देश में जघन्य से जघन्य घटनाएँ घट रही है, लेकिन समाज, सरकार, न्यायालय और मीडिया तीनों सिर्फ इसी घटना पर केन्द्रित हो गए हैं. ऐसी घटनाओं के बाद समाज भावनात्मक आवेग में दोषियों को मौत की सज़ा की मांग करती है.

न्यायालय के फैसले पर नीलू ने कहा, यह फैसला सोचने पर मजबूर करता है. जरुरी नहीं कि सब क्या सोच रहे हैं. इससे पहले कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फांसी होने के समय कुछ लड़के लडकियां रात दिन धरना पर बैठे थे. जिसने मेरे विचार को झकझोर दिया. यह बहुत ही वीभत्स घटना थी, जिसमें फांसी से समाधान निकलता हुआ नहीं दिख रहा है. दुनिया के कुछ देशों में ऐसे अपराधियों के लिए फांसी से भी कठोर दंड देती है. परन्तु ऐसी घटनाएँ लगातार घट रही है. ऐसा लगता है कि लोगों में प्रायश्चित की भावना नहीं बन रही है. नाबालिग बच्चे को सजा से अलग रखा गया, उसे औरत के शरीर और अपराध की पूरी समझ थी. बच्चे इस तरह के जघन्य अपराधों को अंजाम दे रहे हैं यह गंभीर चिंता का विषय है. यह समय जश्न और हार-जीत का अवसर नहीं है. निर्भया समाज की बेटी है, और ये लड़के भी समाज का बेटा है. अतः समाज को इस पर सोचना होगा.

मेरी बेटी सुमिरन ने इस पर कहा कि इस फांसी की सजा से कितनी निर्भया को न्याय मिल पायेगी? इस घटना के बाद भी अनेक ऐसी घटना हुई हैं. जिन किन्हीं कारण से यह घटना एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी वो अलग चर्चा का विषय हो सकती हैं, परन्तु ऐसी दूसरी घटनाओं के बारे में इतनी बातें क्यों नहीं होती हैं? आज जब लोग अपनी व्यक्तिगत् ज़िद को पूरा करने के लिए जान देने को तैयार रहते हैं, तो ऐसे में क्या फांसी की सजा से किसी अपराधी को डर होगा ? मेरी बेटी अपने सहज तर्क से कहती है आप लोग फांसी की सजा का विरोध करते हैं, तो एक फांसी से अनेक फांसी ही तो आखिरकार फासीवाद की विचारधारा की ओर जाती है.उसकी यह बात राजनैतिक एक सोच को दर्शाती है, जिस पर सोचने की जरुरत है.

रांची से मेरे साथ काम करने वाली मयूरी ने फोन पर कहा कि निर्भया की माँ को कुछ समय के लिए चैन मिलेगा परन्तु अनेक माँओं को शान्ति मिलता हुआ नहीं दिख रहा है. फांसी राज्य प्रायोजित मौत है. इससे कोई बड़ा बदलाव हो जाता तो ठीक था लेकिन हत्या के बदले ह्त्या कोई समाधान नहीं है. इस केस में बलात्कार के बाद ह्त्या की गई इसलिए फांसी की सजा हुई है. लेकिन क्रूरतम बलात्कार के मामलों में क्या फैसले हुए हैं वो हमारे सामने है. माननीय न्यायालय को अधिकार है कि कानून से आगे जाकर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं. राज्य की जबाबदेही है कि कानून को शक्ति प्रदान करने लिए उपलब्ध संस्थान को सशक्त बनाया जाय. सेल्जा सेठ ने कहा था अपने बेटे को बेटियों की तरह आदर करना सिखाइये.

अरूपा ने कहा समाज कि समाज के मनोवृतिमें बदलाव की जरुरत है. हमें फांसी से आगे सोचना होगा. अपराधियों के सामाजिक-मानसिक पुनर्वास की रणनीति बनानी होगी. हमें लम्बे समय की योजना बनाकर प्रत्येक स्तर पर लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए काम करना पड़ेगा. विमेंस कालेज की एक छात्रा ने कहा कि मुझे तो उस लड़के की बहन पर गुस्सा आ रहा था, जिसने अपने भाई को माफ़ करने की बात कही. जया ने कहा की इस फैसले को जीत और हार में नहीं देखना चाहिए.