सामाजिक - राजनीतिक सूचना , चेतना व संवाद 

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ग्रामोद्योग

मैं कहूँगा कि अगर गांवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जायेगा. उस हालत में भारत नहीं रहेगा. दुनिया को उसे जो सन्देश देना है उस सन्देश को वह खो देगा.

गांवों में फिर से जान तभी आ सकती है, जब वहां की लूट-खसोट रुक जय. बड़े पैमाने पर माल की पैदावार जरुर ही व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तथा माल निकलने की धुन के साथ-साथ गांवों की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से होनेवाली लूट के लिए जिम्मेदार है. इसलिए हमें इस बात की सबसे ज्यादा कोशिश करनी चाहिए कि गांव हर बात में स्वावलंबी और स्वयंपूर्ण हो जाये. ग्रामोद्योग के इस अंग की अगर अच्छी तरह रक्षा की जय, तो फिर भले ही देहाती लोग आजकल के उन यंत्रों और औजारों से भी काम ले सकते हैं, जिन्हें वे बना और खरीद सकते हैं. शर्त सिर्फ यही है कि लुटने के लिए उनका उपयोग नहीं होना चाहिए.

- हरिजनसेवक, 29-08-1936

आदर्श ग्राम 

आदर्श भारतीय ग्राम इस तरह बनाया जायेगा कि उसमें आसानी से स्वच्छता की पूरी-पूरी व्यवस्था रहे. उसकी झोपड़ियों में पर्याप्त प्रकाश और हवा का प्रबंध होगा, और उनके निर्माण में में जिस सामान का उपयोग होगा वह ऐसा होगा, जो गांव के आसपास पांच मील की त्रिज्या के अन्दर आनेवाले प्रदेश में मिल सके. इन झोपड़ियों में आंगन या खुली जगह होगी, जहाँ उस घर के लोग अपने उपयोग के लिए साग-सब्जियां उगा सकें और अपने मवेशियों को रख सकें. गांव की गलियां और सड़कें जिस धुल को हटाया जा सकता है उससे मुक्त होंगी. उस गांव में उसकी आवश्यकता के अनुसार कुएं होंगे और वे सबके लिए खुले होंगे. उसमे सब लोगों के लिए पूजा के स्थान होंगे, सबके लिए एक सभा-भवन होगा, मवेशियों के चरने के लिए गांव का चारागाह होगा, सहकारी डेयरी होगी, प्राथमिक और माध्यमिक शालाएं होंगी जिनमें मुख्यतः औद्योगिक शिक्षा दी जाएगी, और झगड़ों के निपटारे के लिए ग्राम-पंचायत होगी. वह अपना अनाज, साग-भाजियां और फल तथा खादी खुद पैदा कर लेगा.

- महात्मा, खंड 4, पृ० 144

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राष्ट्रवाद का सच्चा स्वरूप

मैं भारत का उत्थान इसलिए चाहता हूँ कि सारी दुनिया उससे लाभ उठा सके. मैं यह नहीं चाहता कि भारत का उत्थान दुसरे देशों के नाश की नींव पर हो.

- यंग इंडिया, 12 मार्च, 1925

 

यूरोप के पाँवों में पड़ा हुआ अवनत भारत मानव-जाति को कोई आशा नहीं दे सकता. किन्तु जाग्रत और स्वतंत्र भारत  से कराहती हुई दुनिया को शांति और सद्भाव का सन्देश अवश्य देगा.

- यंग इंडिया, 01 जून, 1921

ग्रामोद्योग

मैं कहूँगा कि अगर गांवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जायेगा. उस हालत में भारत नहीं रहेगा. दुनिया को उसे जो सन्देश देना है उस सन्देश को वह खो देगा.

गांवों में फिर से जान तभी आ सकती है, जब वहां की लूट-खसोट रुक जय. बड़े पैमाने पर माल की पैदावार जरुर ही व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तथा माल निकलने की धुन के साथ-साथ गांवों की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से होनेवाली लूट के लिए जिम्मेदार है. इसलिए हमें इस बात की सबसे ज्यादा कोशिश करनी चाहिए कि गांव हर बात में स्वावलंबी और स्वयंपूर्ण हो जाये. ग्रामोद्योग के इस अंग की अगर अच्छी तरह रक्षा की जय, तो फिर भले ही देहाती लोग आजकल के उन यंत्रों और औजारों से भी काम ले सकते हैं, जिन्हें वे बना और खरीद सकते हैं. शर्त सिर्फ यही है कि लुटने के लिए उनका उपयोग नहीं होना चाहिए.

- हरिजनसेवक, 29-08-1936

स्वराज का अर्थ

स्वराज्य से मेरा अभिप्राय है लोक-सम्मति के अनुसार होनेवाला भारतवर्ष का शासन. लोक सम्मति का निश्चय देश के बालिग लोगों की सबसे बड़ी तादाद के मत के जरिये हो, फिर वे चाहे स्त्रियाँ हों या पुरुष, इसी देश के हों या इस देश में आकर बस गए हों. वे लोग ऐसे हों जिन्होंने अपने शारीरिक श्रम के द्वारा राज्य की कुछ सेवा की हो और जिन्होंने मतदाताओं की सूची में अपना नाम लिखवा लिया हो. . . . सच्चा स्वराज्य थोड़े लोगों के द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से नहीं, बल्कि जब सत्ता का दुरूपयोग होता हो तब सब लोगों के द्वारा उसका प्रतिकार करने की क्षमता प्राप्त करके हासिल किया जा सकता है. दुसरे शब्दों में, स्वराज्य जनता में इस बात का ज्ञान पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है, कि सत्ता पर कब्जा करने और उसका नियमन करने की क्षमता उसमें है.

- हिंदी नवजीवन, 29-01-25

सच्चा देशप्रेम 

जिस तरह देशप्रेम का धर्म हमें आज यह सिखाता है कि व्यक्ति को परिवार के लिए, परिवार को ग्राम के लिए, ग्राम को जनपद के लिए और जनपद को प्रदेश के लिए मरना सीखना चाहिए, उसी तरह किसी देश को स्वतंत्र इसलिए होना चाहिए कि वह आवश्यकता होने पर संसार के कल्याण के लिए अपना बलिदान दे सके. अतः राष्ट्रवाद की मेरी कल्पना यह है कि मेरा देश इसलिए स्वाधीन हो कि प्रयोजन उपस्थित होने पर सारा ही देश मानव-जाति की प्राण रक्षा के लिए स्वेच्छापूर्वक मृत्यु का आलिंगन करे. उसमें जातिद्वेष के लिए कोई स्थान नहीं है. मेरी कामना है कि हमारा राष्ट्रप्रेम ऐसा ही हो.

गांधीजी इन इंडियन विलेजेज , पृ0 170