सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के बजट आवंटन में कटौती की है

केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (पीएसई) के पूंजीगत व्यय के बजट राशि को  घटाकर 1.76 लाख करोड़ रुपये (2017-18 में 1.82 लाख करोड़ रुपये) कर दी है. पीएसयू से उम्मीद की गई है कि वे वित्त वर्ष 2018-19 में अपने आंतरिक संसाधनों से 4.78 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय करेंगी, जो वित्त वर्ष 18 के 4.76 लाख करोड़ रुपये से मामूली ज्यादा है.

वहीं पीएसई के लिए कुल पूंजीगत आवंटन वित्त वर्ष 19 में 6.54 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो वित्त वर्ष 18 (आरई) के 6.59 लाख करोड़ रुपये की तुलना में कम है. इस प्रकार  पीएसई का पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2018-19 में गिरकर जीडीपी का 3.5 प्रतिशत रह जाएगा, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 0.4 प्रतिशत कम है. देखने में तो मामूली गिरावट है लेकिन इससे पीएसई कमज़ोर होंगी और रोजगार में कमी आएगी.

निजी क्षेत्र मुनाफा देखकर ही निवेश करती है और अभी मंदी का दौर चल रहा है, ऐसे में सार्वजनिक क्षेत्र में सरकार द्वारा थोड़ा निवेश भी माएने रखता है. सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश में कमी संकेत देता है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र (विकास के ईंजन) को धीरे–धीरे बेपटरी करना चाहती है.

आंकड़ों का स्रोत: ईशान बख्शी / नई दिल्ली February 04, 2018 (business standard)

 

 

देश का हाल – सत्तर साल

आजादी के 70वें साल में हम सभी बधाई के पात्र हैं और इस दौरान कई सरकारें आईं और चली गईं, विकास भी हुआ लेकिन उन्हीं का विकास हुआ जो विकसित थे. आज भी हमारे यहाँ बच्चे अस्पतालों में ओक्सीजन के बिना दम तोड़ देते हैं. लोग अपने पीठ पर शवों को ढोते हैं. महिलाएं सड़कों पर या गाड़ियों में बच्चे को जन्म देने को मजबूर हैं. अस्पतालों में जानवर और मरीज दोनों साथ नजर आते हैं. इलाज के नाम पर डॉक्टर और नर्स से लेकर सफाई कर्मी तक अपने हैसियत के हिसाब से मरीजों का शोषण करते रहते हैं. सरकार मुफ्त जाँच और दवाइयों के दावा के नाम पर अस्पताल कर्मचारी, बिचौलिया, कंपनियों का धंधा बढ़ा रही है.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सबसे बड़ी समस्या सत्ता के लोभियों द्वारा सत्ता में बने रहने और प्राप्त करने के लिए किसी भी हथकंडे का इस्तेमाल रहा है. ये जनता को अपने मीठी-मीठी बातों का जहर पिलाते हैं और उनका हमदर्द होने का ढोंग करते हैं.

युवाओं को रोजगार दिलाने के नाम पर सरकारें बनती आयी हैं परन्तु नवयुवक ठगे जा रहे हैं. आजादी के बाद से ही 20-30 प्रतिशत युवक या तो बेरोजगार रहे हैं या गैर सम्माननीय रोजगार से अपना गुजरा चला रहे है.

बाहरी और आतंरिक सुरक्षा के नाम पर अनाप-शनाप खर्च किया जाता है लेकिन ना तो देश की सीमा सुरक्षित है और ना ही हमारा घर. एक ओर आतंकवाद बढ़ रहा है तो दूसरी ओर सामान्य नागरिक बढ़ते हत्या, बलात्कार, अपहरण, चोरी आदि के कारण असुरक्षित महसूस कर रहे है. महिलाएं लगातार जघन्य अपराधों का शिकार हो रही है. और अफवाहों के माध्यम से उन्हें घर में कैद करने की शाजिश चलती रही है. जघन्य अपराधों की शिकार महिलाओं को तरह-तरह के आरोप लगा कर उल्टे उन्हें ही बदनाम करने की कोशिश की जा रही है.

एक तरफ किसान आमदनी के अभाव में कर्ज तले दब कर आत्महत्या कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उद्योगपति नए उद्योग लगाने के नाम पर खरबों-खरब कर्ज लेकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं और अपने ऐशो आराम के लिए उपयोग कर रहे हैं. कुछ तो हाथ खड़ा कर भाग भी जाते हैं.

जात और धर्म के चक्की में गरीब-गुरबा पीसते रहते हैं और सत्ता में बैठे पक्ष और विपक्षी दल झूठ-मुठ का चीलकों मचाते रहते हैं. आम जन रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाने के लिए संघर्षरत हैं और सरकारें देश को महाशक्ति बनाने का दंभ भरती रही हैं और भर रही हैं.

 

नौकरियों पर ग्रहण

नवयुवक् हमारे देश का भविष्य हैं. नवयुवकों का सर्वांगीण विकास देश का विकास होता है. आबादी का लगभग 40-45% नवयुवक हैं. नौकरी की उपलब्धता विकास का संकेतक है. नवयुवकों को रोजगार सुनिश्चित करना सरकार की प्रथम प्राथमिकता होना चाहिए उनके काबलियत के अनुसार रोजगार प्रदान कर सरकार उनकी जिन्दगी सवारने में मदद के साथ-साथ समाज में शांति और स्थिरता पैदा करती है.

रोजगार सृजन में पिछली सरकार का प्रदर्शन संतोषप्रद नहीं था, लेकिन रोजगार (एक करोड़ प्रति वर्ष) पैदा करने का वादा करने वाली मोदी सरकार के तीन वर्षों की शासन काल में नौकरियों में बढ़ोतरी नहीं बल्कि कटौती हो रही है. इस दौरान विकास दर लगभग 6-7% रहा है जबकि नौकरियों में वृद्धि 1.5-1.8% दर से हुई. श्रम मंत्रालय के (27th quarterly Employment Survey of eight employment intensive industries)  अनुसार,  टेक्सटाइल, चमड़ा उद्योग, मेटल्स, ऑटोमोबाइल्स, जेम्स, ट्रांसपोर्ट, आईटी और हैंडलूम तथा पावरलूम, क्षेत्र में 2015–16 के पहली त्रेमासिक (quarterly) में 43,000 रोजगारों का नुकसान हुआ. एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार वर्षों में प्रति दिन 550 नौकरियां समाप्त हुई हैं. इस दर से 2050 तक लगभग 70 लाख नौकरियां समाप्त होने की सम्भावना है (India lost 550 jobs in a day in last 4 years- The Buisness Standard, 16 Oct, 2016).

कृषि क्षेत्र, लघु एवं मंझोले उद्योग तथा असंगठित क्षेत्र कुल सृजित रोजगार का 95% रोजगार प्रदान करती हैं. इन क्षेत्रों को सरकार का विशेष ध्यान चाहिए. लेकिन सरकार का ध्यान कॉर्पोरेट सेक्टर पर अधिक है जो अरबों रुपए खर्च करते हैं और सिर्फ कुछ हजार नौकरियां ही सृजित करती हैं.

 

किसानों का वर्तमान संघर्ष और सरकार की अनदेखी

सबों का पेट भरने वाले किसान उचित आमदनी के आभाव में आत्महत्या करने को मजबूर हैं. वैसे तो सभी राज्यों में किसान आत्महत्या कर रहे हैं. विडम्बना यह है कि महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या सबसे अधिक है. मध्यप्रदेश में भी किसान त्रस्त हैं. कुछ दिनों से इन दोनों राज्यों के किसान सड़क पर उतरकर कृषि उत्पादों का उचित दाम और कर्ज माफी के लिए सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं. वे दूध, गेहूं, प्याज आदि सड़कों पर फ़ेंक कर अपना आक्रोश का प्रदर्शन कर रहे हैं.
“प्याज उत्पादक राज्यों के होलसेल और रिटेल बाजारों में भी इसकी कीमतें बहुत ज्यादा हैं। प्याज की खेती के कारण बड़ा नुकसान झेल रहे किसानों ने आज यहां जिलाधिकारी कार्यालय के सामने सड़क पर सैकड़ों किलोग्राम प्याज फेंककर विरोध प्रदर्शन किया। इसके साथ ही, सरकार से प्याज का उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करके प्याज की खरीद शुरू करने की मांग की। इंदौर के आस-पास के गांवों के करीब 100 किसान अपनी मोटरसाइकिलों पर प्याज की बोरियां बांधकर मोती तबेला क्षेत्र स्थित जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। किसानों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए इस कार्यालय के सामने मुख्य सड़क पर सैकड़ों किलोग्राम प्याज फेंक दिया। कुछ राहगीरों ने सड़क पर फैला प्याज बटोरना शुरू कर दिया। लेकिन अधिकांश प्याज वाहनों के पहियों के नीचे दबकर बर्बाद हो गया। प्रदर्शनकारी किसानों में शामिल मक्खन पटेल ने संवाददाताओं से कहा, ‘प्याज की बम्पर फसल के कारण थोक बाजार में इसके भाव इस कदर गिर गए हैं कि हमें खेती का लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है.” (स्रोत: किसानों ने सड़क पर सैकड़ों किलो प्याज फेंक कर किया सही MSP नहीं मिलने का विरोध, भाषा, मई 31, 2016).
जनसत्ता (5 जून, 2017) में छपे एक रिपोर्ट “किसानों का महाराष्ट्र बंद जारी, शिवसेना, कांग्रेस सहित वाम दलों ने किया समर्थन” किसानों के आन्दोलन पर प्रकाश डालता है. महाराष्ट्र में छिटपुट हिंसक घटनाओं के बीच किसानों की हड़ताल लगातार पांचवें दिन जारी है। किसान संगठनों ने सोमवार को पहली बार ‘महाराष्ट्र बंद’ का आह्वान कर रखा है। इस बंद को सत्तारूढ़ पार्टी की सहयोगी शिवसेना, विपक्षी कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, किसान और श्रमिक पार्टी, वाम दलों, विभिन्न ट्रेड यूनियनों, गैर-सरकारी संगठनों के साथ ही अन्य किसान समूहों ने समर्थन किया है। इस दौरान बाजार, स्थानीय बाजार और साप्ताहिक बाजार बंद रहेंगे। गोकुल डेयरी जैसे प्रमुख दूध आपूर्तिकर्ताओं ने फल और सब्जियों के किसानों के साथ हड़ताल में भाग लिया है, लेकिन मुंबई में दुग्ध महासंघ सोमवार के बंद से अलग है।

पुलिस बंद से प्रभावित ज्यादातर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में सख्त निगरानी रख रही है, इसके बावजूद वाहनों का आवागमन रोकने के लिए सड़कों पर ट्रक टायर जलाने जैसी छोटी-छोटी घटनाएं हुई हैं। नासिक में किसानों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर ‘धोखाधड़ी’ का आरोप लगाया और विरोध में सोमवार को उनका पुतला जलाया। इसके अलावा पुणे, औरंगाबाद, धुले, सांगली, अहमदनगर, परभणी, सोलापुर, उस्मानाबाद और कोल्हापुर जिलों में सड़क जाम कर जुलूस निकाले जा रहे हैं। मुंबई, पुणे, ठाणे, नवी, औरंगाबाद, नागपुर जैसे शहरी और अन्य अर्ध-शहरी केंद्र इस बंद के दायरे से बाहर हैं, हालांकि बंद के कारण ये इलाके रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की कमी और कीमतों में वृद्धि से प्रभावित हैं।

राज्य के विभिन्न किसान समूहों का नेतृत्वकर्ता संगठन किसान क्रांति द्वारा आहूत यह बंद एक एक जून से जारी किसानों की हड़ताल में तेजी लाने के हिस्से के रूप में है। इस हड़ताल के तहत मंगलवार को सभी सरकारी कार्यालयों को बंद कराने और उसके बाद विधायकों और मंत्रियों के कार्यालयों का घेराव करने की योजना है।

इन दोनों राज्यों और केंद्र में भाजपा की सरकार कान में तेल डालकर सो रही है. गौरतलब है कि भाजपा सरकार अपने आपको किसनों का सबसे बड़ा हितैषी बतलाती है. इसने किसानों को उत्पादन लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देने का वादा किया है, लेकिन यह जुमला ही है. कृषि विशेषज्ञ, देवेन्द्र शर्मा के अनुसार, “भारत में जो सारा खाद्यान्न संकट है, इसके लिए वर्ल्ड बैंक की नीतियां जिम्मेदार है। वर्ल्ड बैंक विकासशील देशों को बेवकूफ बना रहे हैं। पिछले 40 साल की जो तमाम कृषि नीतियां बनी हैं वो कृषि को खत्म करने और किसानों को तबाह करने वाली हैं। आज देश में अनाज का उत्पादन कम नहीं है बल्कि अनाज दबाकर रखे जाने की वजह से हमें अनाज का आयात करना होता है। हम जब भी बाहर से खाद्यान्न आयात कर रहे होते हैं, हम सिर्फ खाद्यान्न आयात नहीं करते बल्कि बेरोजगारी भी साथ-साथ आयात करते हैं।” क्या सरकार वर्ल्ड बैंक द्वारा निर्देशित कृषि नीतियों को बदलने की राजनैतिक शक्ति रखती है? यह तो समय ही बतलायेगा.

न्यूनतम समर्थन मूल्य को देखने से पता चलता है कि वर्ष 2008 से अबतक इसमें लगातार प्रतिशत गिरावट आई है. पिछले 10 वर्षों में केवल वर्ष 2011-12 से 2012-13 में लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि की गई. परन्तु उसके बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य में 3 से 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

देश में किसानों द्वारा लगाया जाने वाला मुख्य फसल चावल-गेंहूँ की न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि किसानों के साथ एक मजाक बन गया है. वर्ष 1999-2000 से 2001-02 में लगभग 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष (एन.डी.ए. की सरकार). वर्ष 2002-03 से 2006-07 में औसतन 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि की गई (यू.पी.ए-I की सरकार). वर्ष 2001 से 2016 तक प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में औसतन 1 से 4 प्रतिशत की वृद्धि की गई. केवल चुनावी वर्षों जैसे 2008-09 में 31.8 प्रतिशत, और 2012-13 में 15.74 प्रतिशत की वृद्धि की गई (यू.पी.ए-I व  यू.पी.ए-II की सरकार). वर्तमान सरकार के पिछले 3 वर्षों में औसतन 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. आंकड़ों से स्पष्ट है कि चाहे कोई भी सरकार हो, किसानों के हालत सुधारने के लिए को भी संवेदनशील और ठोस कदम उठाने के लिए तैयार नहीं है.  

फिलहाल, समाज किसानों के आन्दोलन को समर्थन देकर मजबूती प्रदान करे. सरकार से उम्मीद करते हैं कि वे उनकी मांगों को संवेदनशीलता से लेगी और निदान के लिए उचित कदम उठाएगी.

 

नोटबंदी से विकास दर प्रभावित

मोदी सरकार का मानना है कि नोटबंदी का असर अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ा. वित् मंत्री आजतक इस बात का ढिंढोरा पिटने से  बाज नहीं आ रहे हैं. हाल हीं में 2016-17 के जी.डी.पी. के विकास दर पर सी.एस.ओ. (सांख्यकी विभाग, वित् मंत्रालय, भारत सरकार) द्वारा जारी अनुमानित चतुर्थ तिमाही रिपोर्ट दर्शाता है कि जी.डी.पी. विकास दर 6.1% और जी भी ए 5.6%. अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में गिरावट आयी है, खास कर विनिर्माण, निर्मार और वित्तीय सेवाओं में भारी गिरावट हुई है. यदि 2016-17 का अनुमानित विकास दर लगभग 6 प्रतिशत रहने की उम्मीद है जो अनुमानित विकास दर से 5 प्रतिशत कम है.

जी.वी.ए. ग्रोथ में पहली तिमाही के 8.4 प्रतिशत से घट कर चौथी तिमाही में 3.4 हो गया. इस रिपोर्ट में ये नहीं दर्शाया गया है कि निजी क्षेत्र के आर्थिक स्थिति पर कोई रोशनी नहीं है. जैसा की विदित है निजी क्षेत्र के आर्थिक विकास दर सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश और विकास के बावजूद भी अपेक्षाकृत कम है.

इसका असर पूंजी निर्माण और निजी उपभोग पर भी पड़ा. पूंजी निर्माण का दर सकल घरेलु उत्पाद का 28.5 प्रतिशत रहा और निजी उपभोग 57.3 प्रतिशत रहा. रोजगार के अवसर में कोई वृद्धि नहीं रही. कुल मिलाकर 2016-17 में भरतीय अर्थव्यवस्था के स्थिति डामाडोल रही. सरकार माने या ना माने, बिना सोचे-समझे 86 प्रतिशत नोटबंदी का निर्णय गलत रहा.

स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड, 1 जून 2017

लिखते-लिखते लव हो जाये, पैसा लेकर गायब हो जाये

“लिखते-लिखते लव हो जाये”, यह कलम बनाने वाली एक प्रसिद्ध कंपनी ‘रोटोमैक’ की प्रचार लाइन है. आज इस कंपनी को हम याद नहीं करते हैं क्योंकि कंपनी डूब चुकी है. नीरव मोदी द्वारा पी.एन.बी. को 11 हजार 5 सौ करोड़ का चुना लगाने के बाद एक और घपला सामने आया है. वह है ‘रोटोमैक’ कम्पनी का 3 हजार 6 सौ करोड़ का घोटाला.

सी.बी.आई. द्वारा गिरफ्तार होने के बाद इसके मालिक का कहना है की यह घपला नहीं बैंक का कर्ज है जिसे जल्द हो लौटा दिया जायेगा. यदि यह मान लिया जाये कि यह कर्ज है तो इसका आधार किस आधार पर किया गया था. क्या उन्होंने इसके लिए 7 हजार करोड़ की गारंटी दी थी? यदि उन्होंने कोई गारंटी नहीं दी थी तो यह घोटाला ही माना जायेगा. क्योंकि कम्पनी का लाभ तो वे खा गए और कम्पनी बंद हो गई. अब बैंक का मूल और सूद की जिम्मेदारी कौन लेगा. इसी लाइन में विजय माल्या, नीरव मोदी और अन्य कॉर्पोरेट घराने और व्यवसायी चल रहे हैं, उनके अचल और चल संपत्ति दोनों से कई गुणा ज्यादा बैंक का कर्ज होता है. वे बैंक से कर्ज लेते हैं, फक्ट्रियां खड़ीं करते हैं, तनख्वाह के नाम पर पूंजी से ही सी.ई.ओ., डायरेक्टर के जेब में चला जाता है. बड़ी गाड़ियाँ, बड़ा बंगला, फाइव स्टार होटल में खाना और अन्य ऐशोआराम पर खर्च कर देते है. इस प्रकार पूंजी ख़तम, फैक्ट्री ख़त्म, नौकरियां ख़तम और बैंक का कर्ज जस-के-तस. अतः यह सफ़ेद झूठ और घोटाला का सिलसिला चलता रहता है.

इस फरेबी कारोबार और जनता के पैसे की लूट को रोकने के लिए आर्थिक उदारीकरण पर लगाम लगाना होगा और बैंकिंग सेक्टर के पदाधिकारियों के जवाबदेही की कानून लाना होगा.

 

“माल महाराज का, मिर्जा खेले होली”

पी.एन.बी. में हुए घोटाला, घोटाला नहीं हैं बल्कि बैंकिंग क्षेत्र में पूंजी का खेल है जो आम तौर पर सभी पूंजीपतियों के द्वारा खेले जाने वाला एक रोमांचक खेल है. इस रोमांचक खेल का मोहरा और मूक दर्शक जनता है जो समझती है कि बैंक उसके पैसों का सुरक्षा कवच है. जमा की गई राशी पर दो-चार सौ रूपए मिलने वाला सूद को वह बैंक का आभार मानती है. जनता के बीच के मध्यवर्गीय पदाधिकारी, पूंजीपतियों और नेताओं से मिलकर बैंकों में जमा अरबों रूपए बिसनेस या कारोबार के नाम पर उन्हें देते रहते हैं.

जब कोई व्यक्ति / आम नागरिक अपने लिए बैंकों से उधार लेने जाता है तो उसे गिरवी के रूप में अपना घर, जमीन या दुसरा कीमती सामान गिरवी रखना पड़ता है. लेकिन कॉर्पोरेट जगत के पूंजीपति को यदि हजार या लाख करोड़ में कर्ज लेना होता है तो उसे ऑडिटर द्वारा बनाये गए प्रोजेक्ट और भविष्य में होने वाले लाभ के नाम पर राशि दे दी जाती है. यह केवल भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया के पूंजीवादी देशों का किस्सा है. यदि बिसनेस में कुछ फायदा हुआ तो जनता को उसका सुक्ष्म हिस्सा जनता को मिलता है और जनता इसी में बमबम रहती है. जब महाराज को ही माल की चिंता नहीं है तो मिर्जा तो होली खेलेगा ही. बड़ी बात यह है कि यहाँ मिर्जा की संख्या हजारों में है जो सवा सौ करोड़ जनता को चूसती रहेगी.

 

किसान और समाज का भविष्य खतरे में

मोदी सरकार, किसानों को 50 फीसदी मुनाफा देने का वादा पर अमल तो नहीं ही कर रही है, साथ ही साथ ऐसे अन्तराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर कर रही है कि किसान कहीं के नहीं रहेंगे. खेती के लागत मूल्य में वृद्धि और लागत मूल्य से भी कम मुनाफा के कारण किसान आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठा रहे हैं. सरकार पिछले तीन वर्षों में किसानों की समस्या से निपटने के लिए ना तो किसानों के लिए अलग कोई निधि की व्यवस्था की है और ना ही राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय बाजार में उचित मुनाफा दिलाने के लिए कदम उठा रही है.

अन्तराष्ट्रीय दबाव में कृषि उपज पर आयत शुल्क में कमी लाया गया. जिसके कारण डेयरी उत्पाद से लेकर दलहन, तेलहन आदि बाजार में सस्ते दाम पर भर गए. नतीजतन देश का खेती और किसान की निर्भरता विदेशी कंपनियों पर बढ़ रही है.

देवेन्द्र शर्मा अपने आलेख “अन्तराष्ट्रीय समझौतों की बलि चढ़ती हमारी खेती- दैनिक भास्कर, 10 अगस्त, 2017” में लिखते हैं कि यदि भारत सरकार ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी संधि’ (RCEP) पर हस्ताक्षर करती है तो लगभग 92 फीसदी व्यापारिक वस्तुओं पर से आयत शुल्क हटाया जा सकता है और जिनका आयत शुल्क समाप्त किया जायेगा उसे बाद में बढाया नहीं जा सकेगा. इस प्रकार जो सबसे ख़तरनाक प्रावधान है इसका उल्लेख WTO में भी नहीं है. ऐसा होने से हमारे लगभग 60 करोड़ किसानों का भविष्य ही बर्बाद नहीं होगा बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मूल्य भी नष्ट हो जायेगा.

किसानों का आन्दोलन तो भारत के विभिन्न हिस्सों में चल रहा है लकिन ना तो उन्हें माध्यमवर्गीय समाज का समर्थन है और ना ही सरकार इसे गंभीरता से ले रही है.

विकसित देश अपने यहाँ किसानों को पूरी सुरक्षा प्रदान करते हैं. क्योंकि उन्हें पता है कि किसान केवल समाज का पेट ही नहीं भरते बल्कि राष्ट्र और अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव हैं. हमारे देश में उल्टा है. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आज तक जितनी भी सरकारें हुईं, खेती और किसानी को विदेशी तकनीक और विदेशी पूंजी और अब तो बड़ी कंपनियों के हवाले करती आ रही हैं. इस कारण इस क्षेत्र में ना तो बहुत शोध हुआ और ना ही नया तकनीक विकसित किया गया. खेती की संप्रभुता और किसानों की आत्मनिर्भरता का ख्याल ना पिछली सरकारों ने किया और ना वर्तमान सरकार कर रही है. आगे किसानों का भविष्य अंधकार में है तो हमारा भी भविष्य अंधकारमय होगा. अतः इस विषय पर सबों को गंभीरता से सोचना होगा.

 

कर्ज में कंपनी, वेतन में बढ़ोत्तरी

आरबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार अलग-अलग बैंकों में विभिन्न कंपनियों का कर्ज लगभग 10 लाख करोड़ रूपए है जिन्हें माफ़ कराने के लिए वे सरकारों पर दबाव बनाते हैं. आरबीआई द्वारा गठित एक कमिटी कुछ कंपनियों (लगभग 6 कंपनियों) के लगभग 25 हजार करोड़ रूपए कर्ज माफ़ी की प्रक्रिया चल रहा है. दूसरी तरफ इन्हीं कंपनियों के सी.ई.ओ. की तनख्वाह 200-300 प्रतिशत बढ़ाये जाते हैं. उदहारण के लिए टेक महिंद्रा के सी.ई.ओ. सी.पी. गुरनानी का वेतन 2016 में 233 प्रतिशत बढ़कर 45.3 करोड़ रूपए हो गया. इसी कंपनी के वाईस चेयरमैन विनीत नैयर का वेतन आठ गुना बढ़कर 19.9 करोड़ रूपए पहुँच गया. इन्फोसिस के सी.ई.ओ. विशाल सिक्का के वेतन 71 करोड़ से घट कर 43 करोड़ रूपए हुआ, टी.सी.एस. के सी.ई.ओ. चंद्रशेखरन को करीब 30 करोड़ वेतन मिला. इन्हीं कंपनियों के नीचे स्तर के कर्मचारियों का वेतन 10 से 15 हजार रूपए ही मिलता है. (स्रोत: बिजनेस स्टैण्डर्ड, 6, जुलाई 2017)

राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति औसत आय लगभग 74 हजार रूपए सलाना है. सामाजिक-आर्थिक और जातीय जनगणना 2011 के अनुसार देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या 10 हजार रूपए मासिक से कम कमाती है. इतनी बड़ी आर्थिक असमानता को रोकने के लिए सरकार के पास कोई सोच नहीं है.

 

कॉर्पोरेट जगत ने सरकारी बैंकों का निकाला दिवाला

आर.बी.आई. के रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न सरकारी बैंकों का एन.पी.ए. लगभग 10 लाख करोड़ रुपया है. एन.पी.ए. के बढ़ने का सबसे महत्वपूर्ण कारण कॉर्पोरेट और धनिकों का कर्ज नहीं चुकाना है. आर.बी.आई. के अनुसार एन.पी.ए. किसी बैंक का वैसी संम्पत्ति होता है जो बैंक के आय का स्रोत न हो.  

बैंक जितना एडवांस कर्ज देती है उसका बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट जगत अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए लेते हैं. वी. श्रीधर (breaking the banks, Frontline, 23 जून, 2017) ने लिखा है कि सितम्बर 2016 तक बैंकों द्वारा एडवांस किये गए कर्ज में कॉर्पोरेट का हिस्सा 56.5 प्रतिशत था और एन.पी.ए. में 90 प्रतिशत था. उन्होंने यह भी लिखा है कि “Wilful defaulters” की संख्या में पिछले 15 वर्षों में लगातार बढ़ोत्तरी हो राही है. “Wilful defaulters” वो हैं जिनके पास कर्ज चुकाने की क्षमता है परन्तु चुकाना नहीं चाहते है. वर्ष 2002 में इनकी संख्या 1,676 थी और उनका कुल कर्ज 6,241 करोड़ रुपया था. वर्ष 2016 में उनकी संख्या बढ़ कर 6,857 हो गई और उनका कुल कर्ज हो गया 94,649 करोड़ हो गया. इससे एक बात स्पष्ट होती है कि कर्जखोर जनता के पैसों से अपनी सिर्फ अपनी संपत्ति बढ़ा रहे हैं. वे बड़े-बड़े परियोजना लेते हैं तथा सरकार और समाज को ये कह कर बरगलाते हैं की रोजगार पैदा होगा. लेकिन जनता के पैसों से उनकी तनख्वाह में 200 – 300 गुना बढ़ोतरी होती है, और उनकी संम्पत्ति दिन दोगुनी, रात चौगुनी बढती है.

किसानों और छोटे व्यापारियों का कर्ज सरकार यदि माफ़ करती है तो उस पर बवाल मचता है. औद्योगिक घरानों द्वारा अरबों रूपए कर्ज लेकर बैठे हैं, इसका कोई सुध नहीं लिया जाता. माल्या के केस में उसे जनता का पैसा लेकर विदेश जाने की अनुमति मिल जाती है और आम जनता को छोटी राशि नहीं चुकाने के अपराध में जेल होता है और उसकी संम्पत्ति कुर्क कर ली जाती है.

केंद्र सरकार द्वारा 5 मई को अध्यादेश के माध्यम से रिज़र्व बैंक को एन.पी.ए. को व्यवस्थित करने का अधिकार दिया है. लेकिन कर्जखोर उद्योगपति अपने शर्त पर बैंकों से एन.पी.ए. व्यवस्थित करेंगे. इस तरह के अध्यादेश कोई अर्थ नहीं निकलता है. 4 दशक पहले सरकार बहुत सारे निजी बैंकों का सरकारीकरण की थी, अब लगता है कि सरकार फिर से सभी बैंकों का निजीकरण करना चाहती है.

 

जी एस टी के पड़ने वाले प्रभावों पर एक नजर

भारत सरकार 1 जुलाई से जी.एस.टी. देश में लागू करने जा रही है. वस्तुओं एवं सेवाओं के कीमतों  पर  जी.एस.टी. के पड़ने वाले प्रभावों पर एक नजर. जी.एस.टी. को लागू करने के पीछे दलिल है कि पुरे देश में एक ही कर होगा, जिससे उद्योगपतिओं, व्यापारियों को वस्तुओं के खरीद – बिक्री करने में सहुलिअत होगी. वस्तुओं एवं सेवाओं के कीमतों में भी कमी आएगी. अतः आम जन भी इससे लाभान्वित होगी.

सामानों पर अप्रत्यक्ष कर की दरें एक राज्य से दूसरे राज्य में अलग अलग होती हैं. जी.एस.टी. के लागू होने से टैक्स की दरों में फर्क ख़त्म होगा, लेकिन इससे चीजें सस्ती होंगी ऐसा जरुरी नहीं है. सामानों की कीमतों में थोड़ा फेरबदल हो सकता है.

खाने के कई सामान पर टैक्स नहीं लगने की उम्मीद है. जैसे  विभिन्न तरह के अनाजों पर जी एस टी नहीं लगेगा, लेकिन उनके इनपुट के दामों में बढ़ोतरी के कारण अनाजों की कीमतें भी बढेंगी.

बी.बी.सी. के रिपोर्ट के अनुसार “जब भी किसी खाने की वस्तु को ब्रांड के रूप में बनाया जाएगा तो उस पर टैक्स ज़रूर लगेगा. तो गेहूं पर टैक्स नहीं लगेगा लेकिन अगर आटे का इस्तेमाल बिस्कुट के लिए किया जाएगा तो उस पर पहले की तरह ही जीएसटी लगेगा.

छोटी गाड़ियों पर फिलहाल एक्साइज ड्यूटी 8 फीसदी लगती है जबकि एसयूवी जैसी बड़ी गाड़ियों पर ये दर 30 फीसदी है. साफ़ है अगर सभी राज्यों ने मिलकर जीएसटी की दर को 18 फीसदी तय किया तो छोटी गाड़ियां महंगी हो जाएंगी और बड़ी गाड़ियां सस्ती. राज्यों के बीच टैक्स दरों में फर्क ख़त्म होने के कारण अलग राज्य में गाड़ी रजिस्टर करके कम टैक्स देने की प्रथा भी अब ख़त्म हो जायेगी.

सभी सर्विसेज यानी सेवाएं अब महंगी हो जाएंगी. टेलीकॉम, रेस्टोरेंट में खाना, हवाई टिकट, अस्पताल, स्टॉक ब्रोकर, ब्यूटी पार्लर, बीमा, ड्राई क्लीनिंग जैसी सेवाओं पर केंद्र सरकार सर्विस टैक्स लगाती है. स्वच्छ भारत टैक्स और किसान कल्याण सेस (उपकर) मिलाकर ऐसी 100 से भी ज़्यादा सेवाएं हैं जिन पर टैक्स देना पड़ता है. अगर सभी राज्य मिल कर 18 फीसदी की जीएसटी रेट तय करते हैं तो चपत सभी की जेब पर लगेगी.”

कई रिपोर्टों के अनुसार राज्यों को घाटा होने की संभवना है. उदहारण के लिए राज्य जो सेल्स टैक्स या अन्य टैक्स लगते थे, वे जी एस टी के आने के बाद नहीं लगा पायेंगे. इस प्रकार टैक्सों से होने वाली आय राज्यों को नहीं मिलेगी.   

इस क़ानून के अनुसार सर्विस पर टैक्स लगाने का अधिकार राज्यों को भी मिल जाएगा.फलस्वरूप, जनता की जेब पर असर पड़ना तय है.

“एक देश एक कर” अप्रत्यक्ष कर का नीति बड़े उद्योगपतिओं और व्यपारियों के हित में हो सकता है लेकिन जनता के हित में नहीं. साथ ही साथ राज्यों के आय में कमी आएगी और संसाधन के लिए उनकी निर्भरता भी केंद्र पर बढ़ जाएगी.

 

विचाराधीन कैदियों के हित में लॉ कमीशन की रिपोर्ट

लॉ कमीशन ने 268वीं रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में अनुसंशा की गई है कि सरकार Cr.P.C. क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के बेल सम्बंधित प्रावधानों में बदलाव लाये जिससे विचाराधीन कैदियों रिहाई में मदद मिल सके. जिन कैदियों ने 7 वर्ष की सजा में से एक तिहाई जेल में काट चुके हैं उनकी रिहाई होनी चाहिए. साथ ही साथ वैसे विचाराधीन कैदी जिन्हें 7 वर्षों से ज्यादा की सजा मिली है, यदि वे एक साल जेल में काटे हैं तो उनकी भी रिहाई होनी चाहिए.

सर्वविदित है कि जेलों में विचाराधीन कैदियों की हालत अत्यंत खराब रहती है. लगभग 2 लाख से भी ज्यादा विचाराधीन कैदी बंद हैं जो कुल कैदियों की संख्या का 65 प्रतिशत है. इन विचाराधीन कैदियों में से 70 प्रतिशत अशिक्षित या अर्धशिक्षित हैं जो सामाजिक-आर्थिक रूप से वर्ग से आते हैं. इससे यह पता चलता है कि हमारे यहाँ प्रशासन और न्यायपालिका दोनों उनकी समस्याओं को सुलझाने में गंभीर नहीं है.

लॉ कमीशन ने अपने रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया है कि उक्त कैदियों में 60 प्रतिशत की गिरफ़्तारी अनावश्यक हुई है.

विचाराधीन कैदियों की रिहाई आजतक इसलिए नहीं हुई है क्योंकि उनके पास कोई जमानत लेने वाला नहीं है या जमानत के लिए पैसा नहीं है. अतः लॉ कमीशन की रिपोर्ट को संवेदनशीलता से लेते हुए सरकार को इन विचाराधीन कैदियों के हित में काम करना चाहिए.

 

जनता के “मन की बात” और मोदी सरकार के तीन साल

मोदी सरकार अपने तीन साल पुरे होने पर देश के कोने-कोने में ‘मोदिफेस्ट’ के नाम से जश्न मना राही है. क्या इन उपलब्धियों से जनता को इस दौरान वह अपनी उपलब्धियाँ गिनाने में थक नहीं राही है. जनता अपनी फायदा हुआ है “मन की बात” में मोदी जी और उनके मंत्रियों से सवाल पूछती है कि हर साल दो करोड़ नौकरियां, काला धन, किसानों को लागत का 50% मुनाफा, गरीबों और वंचितों को पौष्टिक भोजन, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, देश में अच्छे दिन का वादा कहाँ गया.

जनता पूछती है कि आपने विदेशों का दौरा करने में सारा रिकॉर्ड तोड़ दिया, विदेशी पूंजी का निवेश में कितना बढ़ोतरी हुआ. आपकी सरकार पूंजी के पलायन को रोकने में क्यों असफल साबीत हो राही है. नोट बंदी तो आपने विदेशी कंपनियों को खुश करने के लिए किया, इसका परिणाम क्या हुआ. लोग नोट बदलने के लिए लाइन में घंटों खड़े रहे और कुछ लोग दम भी तोड़ दिए. आप तो इस पर अफसोस भी नहीं जताए.

चारों तरफ गन्दगी का अम्बार दीखता है. जनता पूछती है कि  “स्वच्छ भारत”  सिर्फ़ प्रचार मात्र है या इसका कोई ठोस उपलब्धि भी है गंगा नदी की सफाई पर काम तो नहीं दिखता लेकिन ताम-झाम जरुर दीखता है.

धर्म, जात के नाम पर दंगे हो रहे हैं, आपकी सरकार जम्मू से कन्याकुमारी तक आराम फरमा राही है. आप विदेश भ्रमण कर रहे हैं.

दलित गुजरात से दक्षिण भारत तक दबाये और मारे जा रहे हैं, लेकिन अप मौन रहते हैं. बीफ़; गौ का मांस या भैंस का मांस, इस पर हो रहे हिंसा को रोकने में सरकार की मंशा नहीं दिखती. ऐसे मुद्दों को राजनीतिक मुद्दा बनाने का प्रेस जारी है लेकिन पशुधनों के नस्ल को सुधरने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है. आपकी पार्टी दलितों का वोट बैंक बनाने के लये तत्परता से लगी है लेकिन उनकी सुरक्षा आपके कार्येकर्ताओं पर निर्भर है.

प्राथमिक, उच्च, विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए सरकार की कोई नीति नहीं दिख रही. योजनाओं एवं संस्थाओं का नाम आपने जरुर बदला है.

जिंदल के बिजनेस को पाकिस्तान में बढ़ावा दिलाने के लिए आप बिना प्रोटोकॉल का पालन किये नवाज शरीफ से मिलने चले गए, लेकिन दो देशों की समस्याओं को सुलझाने के लिए आप और नवाज शरीफ बात – चित नहीं करना चाहते. चीन से आप मीठी – मीठी बात करते हैं लेकिन सरहद से जुडी समस्याओं को सुलझाने के कोई ठोस कदम नहीं उठाये हैं.

विपक्ष में रहते हुए मोदी जी ने तब की सरकार पर भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा के कई आरोप लगाए थे, परन्तु उस पर अब तक कोई स्पष्ट दिशा नहीं है. कुल मिलाकर देखा जाये तो मोदी सरकार की तीन वर्ष की उपलब्धि विवादों से भरा रहा है.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना से क्या स्वास्थ्य सुरक्षित रहेगा?

इस बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत 10 करोड़ गरीब परिवारों के लिए प्रति वर्ष 5 लाख रुपये के स्वास्थ्य बीमा का प्रावधान किया गया है. इसका लाभ गरीब परिवारों को मिलेगा या बीमा कंपनियों और प्राइवेट अस्पतालों को, यह तो समय ही बताएगा. फिलहाल, इसके दुरूपयोग को रोकने के लिए सरकार के पास कोई व्यवस्था नहीं है.

आधारभूत संरचना का अभाव, डॉक्टर और नर्सों का अभाव, दवाओं तथा अन्य सुविधाओं का अभाव जैसी समस्याओं पर ध्यान देने की जरुरत है. ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों की भरी कमी है. गवर्नमेंट रूरल हेल्थ स्टैटिक्स के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 1800 अस्पताल हैं जो आधी आबादी के लिए भी पर्याप्त नहीं है. 40,000 से अधिक भवनों की जरुरत है. 1000 की आबादी पर मात्र 0.76% पर डॉक्टर हैं (सम्पादकीय, अंग्रेजी बिजनेस स्टैण्डर्ड, 8 फरवरी, 2018). लगभग 65% नर्सों की कमी के कारण अस्पताल ठीक से नहीं चल पा रहे हैं. नीति आयोग के नवीनतम राज्य आधारित स्वास्थ्य सम्बंधित आकडों के अनुसार बिहार, हरियाणा और राजस्थान के आधी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में नर्स नहीं है. बिहार के 63% प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं हैं. विकसित राज्यों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. तमिलनाडू के 5.9% तथा केरल के 7.6% प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं हैं.

2018-19 के बजट में स्वास्थ्य मद में 5,447 करोड़ (47,353 करोड़ से बढ़कर 52,800 करोड़, 12%) का वृद्धि किया गया है. इस प्रकार जी. डी. पी. का लगभग 1.3% ही खर्च हो रहा है जो नेशनल हेल्थ पालिसी, 2017 द्वारा तय किये गए जी.डी.पी के 2.5% से काफी कम है. विशेषज्ञों के अनुसार स्वास्थ्य के आवंटन में प्रति वर्ष 40% का वृद्धि होना चाहिए. 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के बजट में कटौती की गई है. 2017-18 में 31292 करोड़ था जिसे घटाकर इस बजट में 30634 करोड़ कर दिया गया. एन.आर.एच.एम. के बजट में पिछले वर्ष की तुलना में 3191 करोड़ (16%) करोड़ बढाया गया है. एन.यू.एच.एम में 875 करोड़ आवंटित किया गया है (123 करोड़ का वृद्धि). प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसे महत्वपूर्ण योजना के बजट में कटौती (2700 से घटकर 2400 करोड़) की गई है. (स्रोत: वित्त मंत्री का बजट भाषण)

अतः जरूरी है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला स्तर की अस्पतालों, डॉक्टरों और नर्सों की कमियों को पूरा किया जाए. अस्पतालों को सुचारू रूप से चलाने के लिए जनभागीदारी और जवाबदेही वाली व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के शोधों पर खर्च बढ़ाने की जरुरत है.

 

निवेश और बचत में गिरावट

जितना निवेश होगा उतना ही लाभ होगा -हिमैन मिंस्की (03 अध्याय, आर्थिक समीक्षा खंड एक, 2017-18)
हमारे देश में हिमैन मिंस्की के सिद्धांत के अनुरूप 1980-90 के दशक से निवेश को बढ़ावा देकर आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की कोशिश जारी है, कुछ कामयाबी 2007 तक तो मिला लेकिन तब से आजतक विकास की गाड़ी पटरी से उतर चुकी है. 03 अध्याय. आर्थिक समीक्षा खंड एक, 2017-18 के अनुसार “सकल स्थिर पूंजी निर्माण और जीडीपी: (137,51 लाख करोड़, स्रोत: योजना आयोग, भारत सरकार) का अनुपात 2003 में 26.5 प्रतिशत से बढ़कर 2007 में 35.6 प्रतिशत हो गया था लेकिन 2017 में गिरकर 26.4 प्रतिशत हो गया. घरेलू बचत और जीडीपी के अनुपात में भी इसी प्रकार का बदलाव दिखता है. जो 2003 में 29.2 प्रतिशत से से बढ़कर 2017 में 29 प्रतिशत पर दोबारा गिरने के पहले 2007 में 38.3 प्रतिशत के शीर्ष पर था”. इस प्रकार सकल स्थिर पूंजी निर्माण और घरेलू बचत दर्शाता है निवेश में कमी तथा महंगाई के कारण लोगों द्वारा बचत करने में असमर्थता.” निवेश के लिए संचयी गिरावट 2017 और 2016 में बचत की तुलना में कम हुई है. परन्तु निवेश अधिक निचले स्तर तक गिर गया है. 2007-08 से 2015-16 तक निवेश में आई 6.3 प्रतिशत की गिरावट में से 5 प्रतिशत बिन्दुओं की गिरावट के लिए अकेले निजी निवेश उत्तरदायी रहा. उसी अवधि की तुलना में बचत में 8 प्रतिशत से अधिक गिरावट में परिवारिक और सरकारी बचत में कमी का बराबर का हिस्सा रहा है. “निजी क्षेत्र निवेश में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है फिर भी सरकार निजी क्षेत्र को बढावा देने के लिए सभी प्रकार का छूट दे रही है.
सरकारी निवेश में भी कमी और निजी क्षेत्र के विकास में भी कमी तो विकास कैसे होगा रोजगार कहाँ से आएगा, सरकार को जुमलेबाजी को छोड़कर निवेश खासकर सरकारी निवेश को बढाना चहिए.

 

धन कमाओ देश में फिर बस जाओ विदेश में

धन कमाओ इस देश में और बस जाओ विदेश में, यह बात लागू होती है उन भारतीय धनकुबेरों पर जो वर्षों से देश का धन विदेशों में ले जा रहे हैं और वहीँ बस भी जा रहे हैं. “ब्रेन ड्रेन” तथा “धन ड्रेन” का किस्सा तो अंग्रेजों के आगमन से शुरू हुआ जो आज भी जारी है.

हिंदुस्तान अख़बार (5 फरवरी 2018) में छपे रिपोर्ट के अनुसार,” भारत की नागरिकता छोडकर विदेशों में जाकर बसने वाले धनकुबेरों की तादाद पिछले कुछ साल से लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2017 में सात हजार धनकुबेरों ने भारत की नागरिकता छोड़कर किसी और देश की नागरिकता ले ली. धनपतियों के पलायन की यह तादाद वर्ष 2016 की तुलना में 16 फीसदी अधिक है. “न्यू वर्ल्ड वेल्थ” की ताजा रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है.” 2015 में 4000 भारतियों, 2016 में 6000 भारतियों तथा 2017 में 7000 भारतियों ने भारत छोड़ा था. रिपोर्ट यह भी लिखता है कि भारतीय अमीरों की पहली पसंद अमेरिका है. अमेरिका के अलावा संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड ठिकाने हैं. 

सम्पति का वैश्विक पलायन 2015 में 64,000 करोड़ था जो 2017 में 95,000 करोड़ हो गया. सम्पति का वैश्विक पलायन का फायदा अमीर देशों को मिलता है क्योंकि अमीर लोग अपने देश का धन वहीँ जमा कर रहे हैं. इस प्रकार का पलायन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय है. अमीर देश और अमीर होते जाते हैं तो दूसरी ओर गरीब देश और गरीब होते जाते हैं. आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उथल-पुथल पैदा होता है. इन समस्याओं का समाधान तब ही संभव है जब अमीर और गरीब देशों की सरकारें ऐसे धनिकों पर नकेल कसेगी.

 

न्यायाधिशों की कमी न्याय दिलाने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा

पिछले 10 वर्षों से सर्वोचय न्यालय में 3 प्रतिशत, उच्च न्यालयों में 19 प्रतिशत और जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में 9 प्रतिशत लंबित मामलें संकेत हैं, सुस्त न्याय व्यवस्था का.

आकड़ों के अनुसार भारत में न्यायिक क्षेत्र की वास्तविक स्थिति संतोषप्रद नहीं है. सर्वोचय न्यायालय के आकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2017 तक उच्च न्यायालयों में 34 लाख से अधिक मामलें लंबित हैं. जिसमें इलाहाबाद और जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय के मामले शामिल नहीं है. पिछले एक वर्ष में सर्वोच्च न्यायालय में मात्र 6000 लंबित मामलों (60000 से घटकर 54000) का निपटारा हुआ.

साथ ही सर्वोचय न्यायालय में 3 प्रतिशत (54719 में से 1550), उच्च न्यायालय में 19 प्रतिशत 34.3 लाख में से 6.4 लाख) और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 9 प्रतिशत मामले 10 वर्ष से अधिक समय से लंबित है. 10 वर्ष से अधिक समय से लंबित मामलों का कुल औसत 8.63 प्रतिशत है. एक सामाजिक संस्था “दक्ष” ने 331 जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में वर्ष 2000-2016 के बीच एक अध्ययन कराया. इसके रिर्पोट के अनुसार 56 प्रतिशत मामलों का निर्णय होने में 10.15 वर्ष का समय लगा था. मात्र 18 प्रतिशत मामले ही पांच वर्ष से कम समय में निपटाए गए.

एक नजर विभिन्न स्तर के न्यायालयों में न्यायाधिशों के पद खाली हैं. 2014 में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या को 906 से बढ़ाकर 2017 में 1,079 कर दी गई. वहीं जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में भी यह संख्या 20,214 से बढ़ाकर 22,677 कर दी गई. लेकिन कुल पद और न्यायाधीशों की वास्तविक संख्या में बड़ा अंतर है. उच्च न्यायालयों की लगभग 37 प्रतिशत (1079 में से 395) और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 26 प्रतिशत (22,677 में से  5,984) न्यायाधीषोंशों के पद खाली पड़ें है.

विभिन्न विधि आयोग की रिर्पोट के आधार पर अधीनस्थ न्यायालयों में 1,30,000 से अधिक न्यायाधीशों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में केवल 22,677 पदों की सृजन किया गया है और इनमें से भी 5,984 पद खाली पड़े हैं. (स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड  दिनांक: 17 जनवरी 2018) 

न्यायधीश, न्याय व्यवस्था के मुख्य स्तम्भ हैं यदि मुख्य स्तम्भ ही नहीं मजबूत रहेगा तो न्यायालय कहां टिकेगा. न्याय वयवस्था में न्यायाधिशों का कमी होना दर्शाता है कि सरकारें न्याय के प्रति सजग नहीं रही है और आज भी नहीं है, यह जानते हुए भी की न्याय में देरी से समाज में असंतोष फैलता है.

 

अविष्कार है या विनाशकार

 

पश्चिम के वैज्ञानिक औद्यगिक क्रांति से ही ऐसी-ऐसी तकनिकों का अविष्कार कर रहे हैं जो मानव समाज के एक छोटे हिस्से को प्रगति के पथ पर ले जाती है तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा बर्बादी के कागार पर पहुँच जाता है. आज के सन्दर्भ में रोबोट का अविष्कार और इसका सेक्स डॉल से लेकर युद्ध में सैनिक के रूप में, रेस्टोरेंट में वेटर के रूप में, कारखानों में, स्वचालित कारों में इस्तेमाल की तैयारी चल रही है.  

हिंदुस्तान (07 अक्टूबर, 2017) के अनुसार “वर्ल्ड इकनोमिक फोरम” में पेश आई.प्यू. के रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले पाँच वर्षों में विकसित देशों की 51 लाख नौकरियां रोबोट के कारण चली जाएंगी”. इसका असर विकसित देशों पर ही नहीं पड़ेगा बल्कि पुरे विश्व पर पड़ेगा, खासकर अविकसित एवं विकासशील राष्ट्रों पर. नव उदारवाद आर्थिक नीति के आने के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ सस्ते कुशल मजदूर के लिए विकासशील देशों पर निर्भर हैं. अतः वे ऑटोमेशन करके इन मजदूरों का छटनी करेंगी. इतना ही नहीं यदि विकसित देशों में नौकरियां जाएंगी तो बाजार प्रभावित होगा और इसका असर विकासशील देशों के निर्यात पर पड़ेगा. नतीजतन, विश्व-स्तर पर रोजगार का संकट गहराएगा.

 

 

यावत जीवम, सुखं जीवेत l ऋणं क्रीबेत घृतं पिबेत् ll

 

यह दोहा हम भारतियों पर सटीक बैठ रहा है. बाजार के चकाचौंध में हम अपनी विलासिताओं को सुरसा की मुहं की भांति हर क्षण बढ़ा रहे हैं जो हमें, हमारे समाज और देश को कर्ज के समंदर में डुबोने को तैयार है. नवउदारवादी नीति की शुरुआत से ही सरकार ने अनियंत्रित बाजार को प्रोत्साहित किया साथ-ही-साथ कर्ज के लिए बैंकों का दरवाजा भी खोल दिया. परिणामस्वरूप घर, शिक्षा और अन्य मामूली जरूरतों के लिए भी कर्ज हमें मिल जाता है. यहाँ तक की सामान बेचने वाली कंपनियां भी इन्स्टालमेन्ट के रूप में कर्ज देने को तैयार हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार आज की तारीख में देश में कुल कर्ज में से घरेलु कर्ज (परिवार आधारित) 25 लाख रूपए हो गया है जिसमें पिछले तीन वर्षों 65 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. यदि कॉर्पोरेट कर्ज (11 लाख करोड़ से अधिक) और पारिवारिक कर्ज दोनों को मिलाया जाये तो यह राशि लगभग 46 लाख करोड़ हो जायेगा.

इस तरह से बढ़ते कर्जों का बोझ देश के अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है, मुद्रास्फीति में वृद्धि में सहायक, महंगाई में वृद्धि, कंपनियां अपने फायदे के लिए प्रकृतिक संसाधनों का दोहन करती हैं. नतीजतन समाज, पर्यावरण और देश सभी के लिए खतरा है.

 

बाजार की मार किसान बेहाल

अधिक उपज हो तो किसान मरता है, उपज ना हो तो किसान मरता है. किसी भी स्थिति में किसानों का भला नहीं होता है. साल 2016 में लगभग सभी फसलों (दलहन, तेलहन, अनाज) की अच्छी उपज हुई. कुल मिलाकर खाद्यान्न की उपज लगभग 270 मिलियन मीट्रिक टन हुई, और 2016-17 में कृषि का विकास दर लगभग 4.1 प्रतिशत रहा परन्तु इसका फायदा किसानों को नहीं मिला. खाद्यान्नों के दामों में 60 से 64 प्रतिशत गिरावट आयी.

दलहन के उत्पादन में वर्ष 2014-15 में 17.5 मिलियन टन से बढ़ कर वर्ष 2016-17 में 22.14 मिलियन टन (29 प्रतिशत की वृद्धि) हुआ. अरहर दाल के उत्पादन 2.81 मिलियन टन से बढकर 4.23 मिलियन टन हुआ (50 प्रतिशत की वृद्धि).   

अधिक उपज के कारण दलहन के दामों में काफी गिरावट आई. अरहर दाल का दाम खुले बाजार में दिसम्बर 2015 तक 11 हजार रूपए प्रति क्विंटल था जो घट कर 3800 से 4000 (63 प्रतिशत की गिरावट) हो गया- सरकारी भाव से 20 प्रतिशत कम (सरकारी मूल्य- 5050 प्रति क्विंटल).

मुख्य आर्थिक सलाहकार के नेतृत्व में गठित समिति ने वर्ष 2017 के लिए अरहर दाल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6000 रूपए और 2018 के लिए. 7000 अनुसंशित किया. मार्च 2017 में समर्थन मूल्य 5050 था. यह एक उदहारण है.

दलहन के दामों में भरी गिरवट के कारण किसानों पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा .न्यूनतम समर्थन मूल्य का जटिल प्रक्रिया और भुगतान में देरी के कारण किसानों ने अपना उत्पादन को खुले बाजार में बेचा. वे न तो कर्ज चुकाने के स्थिति में थे और ना ही परिवार चलाने की स्थिति में. इस बदहाल स्थिति में अनेकों किसानों ने अपनी जीवन समाप्त कर ली. सरकार को उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना चाहिए और इसके लिए सरल प्रक्रिया बनाना चाहिए.

- 9 जून 2017, बिज़नस स्टैण्डर्ड

 

विकास दर में कमी और राजकोषीय घाटा

पिछले पांच तिमाही में औसत आर्थिक वृद्धिदर 7.1 प्रतिशत रहा जबकि इसी दौरान राजकोषीय घाटा जी.डी.पी. का 9.3 प्रतिशत हो गया. सेवा क्षेत्र और विनिर्माण क्षेत्र दोनों में वृद्धि दर अनुमान से कम रहा. साथ ही साथ खान क्षेत्र, खेती क्षेत्र और निर्माण क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई. 7.1 प्रतिशत का वृद्धिदर माध्मय वर्ग के निजी उपभोग में वृद्धि के कारण हुई है. स्पष्ट है कि मध्यम वर्ग बाजार को खींच रही है.जी.वी.ए. का ग्रोथ दर 7.3 प्रतिशत रहा.  चिंता का विषय यह कि पूंजी निर्माण और निवेश में वर्ष 2016 का प्रथम दो तिमाही- क्रमशः 7.1 व 9.7 को छोड़ कर वर्ष 2016 का तीसरे व चौथे और वर्ष 2017 की पहली तिमाही में क्रमशः 1.2, -1.9, -3.1 रही.

इस दौरान बैंकों द्वारा उद्योगों को दिया जाने वाला क्रेडिट दर भी केवल 5 प्रतिशत रहा जो पिछले एक दशक में सबसे कम है. छोटे और मंझोले उद्योग लड़खड़ाते हुए किसी तरह चल रहे है. नतीजतन रोजगार में कोई वृद्धि नहीं हुई. टेलकम सेक्टर जो विकास का इंजन माना जाता रहा है उस पर 4.5 लाख करोड़ का कर्ज है और लगातार लोगों की छंटनी हो रही है.

स्रोत- Shaky start to FY17, 1st Sep. 2016, Business Standard and GDP growth not as healthy as it seems: Devangshu Datta, 6th March 2017, Business Standard

 

उन्मादी भीड़ का दहशत

उन्मादी भीड़ द्वारा लगातार मासूम और असहाय लोगों की हत्याएं की जा रहीं हैं और प्रान्त की सरकारें उन्हें रोकने में विफल रही हैं. कुछ घटनाएँ जैसे दिल्ली के दादरी इलाके में सितम्बर 2015 में अख़लाक़ नाम के अधेड़ की अपने घर में फ्रिज में गाय के मांस रखने की अफवाह पर हत्या, पहलु खान का गाय खरीद कर ले जाते समय राजस्थान के अलवर में गौरक्षक दल के लोगों द्वारा हत्या (1 अप्रैल 2017), दिल्ली के बल्लभगढ़ में ईद की खरीदारी कर के लोकल ट्रेन से लौट रहे 16 वर्षीय युवक जुनैद की अन्य यात्रियों द्वारा हत्या, कश्मीर में डी.एस.पी. आयूब पंडित की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या, जमशेदपुर में भीड़ द्वारा विकास और गौतम की हत्या, झारखंड के सरायकेला खरसावाँ जिले के शोभापुर गांव में बच्चा चोर के आरोप में 18 मई को भीड़ द्वारा चार लोगों की हत्या मृतकों में घाटशिला के फूलपाल निवासी मो. नईम, हल्दीपोखर के रहने वाले मो. सज्जाद उर्फ सज्जू, मो. सिराज और मो अलीम शामिल हैं।

अनियंत्रित भीड़ का कोई चरित्र नहीं होता है, यह आवेग में काम करती है. इनमे उन्माद भरने वालों में आज सोशल मिडिया, राजनैतिक पार्टियाँ और छोटे-छोटे सामाजिक समूह शामील है. यह भी देखा जा रहा है कि कुछ खास संप्रदाय के लोग ही इस उन्मादी भीड़ के लक्ष्य है. जिन प्रान्तों में ये घटनाएँ हो रहीं हैं वहां एक खास विचारधारा की सरकार है, जो इन्हें अपरोक्ष रूप से आपने राजनितिक हितों के लिए इस्तेमाल कर रही है.

विचारधारा पर बहस एक अनवरत प्रक्रिया है. इसे हिंसक तरीकों से कुचलना अधिनायकवाद को बढ़ावा देना है. अतः जनमानस को सोचने की जरुरत है कि क्या हमें विचारधारा की लड़ाई में हिंसा को बढ़ावा दें?

 

प्रधानमंत्री द्वारा तीनों लोकों का भ्रमण

हमारे प्रधानमंत्री देश में सुख, समृद्धि और शांति लाने के लिए वैशिक परिक्रमा में लगे हैं. यूरोप से लेकर अमेरिका, और रूस से लेकर जापान तक के दुरी तय कर चुके. अब जहाँ भी जाते हैं, वहां के लोगों से अपील करते हैं- ‘प्रभु हमारे देश में समृद्धि लायें, हम आपसे करजोर विनती करते हैं. 128 करोड़ जनता आपके लिए टकटकी लगाये बैठें हैं, उन्हें बाजार ना समझें वे आपके जजमान हैं, वे आपकी सेवा करेंगे. आप अपना धन हमारे देश में लगायें और मुनाफे के साथ दुगना ले जाएँ, हमारी जनता और हम आपको इसके लिए आमंत्रित करते हैं.”

वे उनसे आपिल करते हैं कि पुरे विश्व में शांति व्यवस्था हो केवल भारत छोड़ कर. क्योंकि, भारत में शांति होने से, उनके सेवा की लोगों की जरूरत नहीं होगी और उनकी गद्दी खतरे में पड़ जायेगा. पुरे विश्व में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो परन्तु भारत में नहीं क्योंकि इससे जनता सवाल करेगी, और जवाब मेरे बस का नहीं है.

जानवरों के सुरक्षा के नाम पर इंसानों का खून उनके गण पानी की तरह बहा रहे हैं और वे विश्व में शांति और समृद्धि के लिए जनता का पैसा बहा रहे हैं.