निंदक नियरे राखिये . . .

(व्यंग्य)

 

का हो चचा, कहाँ चल दिए !

लो, कर दिया न जतरा खराब, कई बार कहे हैं कि पीछे से मत टोका कर.

अच्छा, लेकिन ऐसा कौन सा किसी के लिए रिश्ते का बात करने जा रहे हैं कि जतरा खराब हो गया ! और एतना तमतमाएल काहे हैं?

तुमको क्या बताएं, आजकल किसी पर भरोसा करने लायक नहीं है. जिसकी मदद करो वही पीठ में छुरा घोपता है. और हिम्मत तो देखो हमारे सामने हमहीं को गलत ठहरता है.

का बात कर रहे हैं, ऊ रमेश का इतना हिम्मत ! लेकिन चचा, कबीर दास ने कहा है- “निंदक नियरे राखिये. . . I

अरे बस करो, कहावत तो ये भी है, कि “घर का भेदी लंका ढाए”!

ई सब कहावत का कोई मतलब नहीं है. लंका तो हम अपने देश में बईठे- बईठे ढाह सकते हैं बस एकगो मिसाईल छोड़े पड़ेगा.

अरे ऊ कबीर दास के ज़माने में साबुन नहीं होगा ना इसलिए कह दिए कि जब कोई आपकी शिकायत आपके सामने करेगा तो उसके साथ उठापटक में सब मईल (मैल) छूट जायेगा. उस समय लोगों का स्वभाव भी गंदा होगा. आज कल के ज़माने में सुन्दर, चिक्कन चेहरा, महंगा और ब्रांडेड कपड़ा से हमरा गिनती शरीफ लोगों में होता है. मईल और पुराना कपड़ा में तो आपको लोग चोर, भिखारी, लफुआ समझेगा. आजकल तो ऐसे कपड़े में कोई आपको ‘किसानो’ समझ सकता है.

और अगर स्वभाव निर्मल करना है तो उसके लिए घर में भेदिया पालने की जरुरत नहीं है. मार्केट में निर्मल बाबा और उनके जैसे योगी, जोगी, स्वयंभू बाबा लोग की कमी नहीं है. बस आपके पास पैसा होना चाहिए, आपका स्वभाव, चरित्र सब निर्मल हो जायेगा. इन बाबा लोग के पास हर प्रकार का साबुन है.

त, इसका मतलब ई हुआ कि पैसा से सब पवित्र हो जायेगा !

जरुर, हर युग में पैसा से बड़ा साबुन कोई नहीं है. इसीलिए महान कवि तुलसीदास दास जी ने कहा था- “समरथ को नहीं दोष गोसाईं” .

और तो और हमारे देश में गंगा मईया भी बहती है. अगर आपके पास समरथ नहीं है तो आप गंगा मईया में डुबकी लगाकर भी निर्मल हो सकते हैं. बच्चे चाहे कितने भी बड़े क्यूँ ना हो जाएं माँ के लिए वह छोटा ही रहता है, और जब बच्चा माँ की गोद गंदा करता है तो माँ थोड़े ना बुरा मानती है. इसीलिए तो हम अपनी सारी गंदगी बेझिझक गंगा मईया के गोद में डाल देते हैं.

ओहो चचा, आप एतना ज्ञान झाड़ दिए पर ई नहीं पता चला कि आप गुस्से में काहे हैं?

अरे ऊ रमेसवा, आज ही हमको ई महिना का किराया दिया और ये बात जाकर किराना दुकान वाले शंकर लाल के पास फूंक आया. अभी थोड़ा देर पहले जब हमारा पोता शंकरलाल के दुकान पर बिस्कुट लाने गया तो वह पहले पुराना हिसाब करने के लिए कह कर हमरे पोता को खाली हाथ लौटा दिया. और कहा कि पैसा चंपले रहते हैं और हमारे यहाँ उधारी चलाते है.

अब तुम ही बताओ, ई रमेसवा घर के भेदी वाला काम किया है कि नहीं. हम उस पर दया खाकर अपने घर में शरण दिए और ऊ आज हमहीं को कहता है कि पैसा होते हुए उधारी लगाना गलत है.

और जरा सोचो, ई देश में पैसा रहते हुए कर्ज लेना तो देश के विकास में अपना योगदान देना है. तभी तो टाटा, अम्बानी, अडानी और ऐसे ही कई अरबपति कर्ज लेते जाते हैं और देश का विकास करते हैं. सरकार कभी कर्ज चुकाने के लिए दबाव बनाती है? नहीं ना !

तो चचा, कर्ज लेकर किसान काहे आत्महत्या कर लेते हैं?

यही समस्या है तुम जैसों की ! कबीर दास को भजने वाले अभी भी “कस्तूरी” अपनी कुण्डली में ही ढूढ़ते हैं, जबकि अब तो यह स्वदेशी स्टोर पर बिकता है. देश का विकास, देश चलाने वालों के विकास पर निर्भर है.

किसान कर्ज लेकर सारा तो मिट्टी में मिला देते हैं (मेरा मतलब है खेती में लगा देते हैं). इससे देश चलाने वालों का कोई विकास नहीं होता. जब घर का मुखिया समृद्ध होगा तभी घर के लोग सुखी रह पाएंगे ना. दूसरी बात यह है कि इनके पास इतना सामर्थ भी नहीं होता है कि ये अपना दोष मिटा सकें.

ये प्रेमचंद के ज़माने का कर्ज तो है नहीं कि आप कई पीढ़ियों तक चुकाते रहेंगे. अब तो न्याय होता है, वह भी सरकारी कोरट में.

और बेटा, एक बात गांठ बांध लो, तुम या तो ‘जीयो’ की बात करो या उनके मन की. किसानों की या अपने मन की बात की तो लेने के देने पड़ जायेंगे. फिर तुम्हारे साथ भी न्याय हो जायेगा.

अब हम आते हैं शंकरलाल का हीसाब करके, उसके बाद रमेसवो का हीसाब करना है. और सुनो, आज के बाद हमको पीछे से टोकना मत नहीं तो तुम्हारा भी हीसाब कर देंगे, समझे !

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प्रभाकर कुमार 

सामाजिक कार्यकर्ता, हस्तक्षेप पत्रिका के सम्पादक मंडल के सदस्य

ईमेल: p.sunny86@gmail.com