स्टार्टअप के लिए पूंजी जुटाना और बाजार तलाशना बड़ी चुनौती

 

भारत में बड़े शैक्षणिक संस्थानों के इंजीनियरिंग और प्रबंधन के विद्यार्थियों / युवाओं द्वारा नये व्यवसाय शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं. सरकार की जुमलेबाजी से उन्हें ना तो आधारभूत संरचना, आवश्यक पूंजी और ना ही बाजार उपलब्ध हो पा रहा है. समाचार पत्र मिंट ने इस वर्ष के आरंभ में 41 स्टार्टअप का विश्लेषण किया था। उससे पता चला था कि मार्च 2016 में समाप्त हुए वर्ष में इन कंपनियों को 24,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने के क्रम में 16,000 करोड़ रुपये का घाटा सहना पड़ा। अधिकांश मामलों में विश्लेषण यह दिखाता है कि घाटा अच्छी तादाद में मार्जिन को पार कर गया। पारंपरिक मानकों के आधार पर देखें तो ये स्टार्टअप दरअसल कुछ संकटग्रस्त कंपनियों से ज्यादा अहमियत नहीं रखते। (स्रोत: http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=135647) इस रिपोर्ट से यह पता चलता है कि भारत में उद्योग खड़ा करना आज भी टेढ़ी खीर है.  

रोजगार देने के नाम पर तो सरकार पहले ही यह कहते हुए हाथ खिंच चुकी है कि इतनी बड़ी जनसंख्या को रोजगार दिया ही नहीं जा सकता. एक करोड़ युवाओं को प्रतिवर्ष रोजगार देने का वादा करने वाली सरकार केवल एक लाख रोजगार उपलब्ध करा पाई (श्रम विभाग, भारत सरकार). अतः ना तो रोजगार है और ना ही धंधा करने के लिए उपयुक्त माहौल और संसाधन.

राष्ट्रपति चुनाव और जात-भात

जात-भात और राजनीती तीनों में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है. अपवादों को छोड़कर, राजनीति जातीय समीकरण के बिना सफल नहीं होती है. आगामी 16 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव जातीय के लिए पार्टियाँ जातीय समीकरण तलाश रही हैं. इस खेल में भारतीय जनता पार्टी के पलड़ा भारी दिख रहा है. कांग्रेस ने, मीरा कुमार (बिहार के रविदास समुदाय) को अपना उम्मीदवार बनाया है तो भारतीय जनता पार्टी ने रामनाथ कोविंद (उत्तरप्रदेश के कोली समुदाय) को. दोनों उम्मीदवार दलित समुदाय से आते हैं, लेकिन बी.जे.पी. ने कोविंद को मैदान में उतारकर काग्रेस के मीरा कुमार (एक रविदास) के खिलाफ गैर-रविदास का कार्ड खेलकर दलित समूह के गैर-रविदास सांसदों और विधायकों का वोट अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रही है.

जातीय जोड़-तोड़ के राजनीति के खेल को कांग्रेस बखूबी खेलती थी, लेकिन अब इस खेल में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस से आगे निकल रही है. इस बार के चुनाव में यू.पी.ए. के घटक दल कांग्रेस का टांग खिंच रही है.

भारतीय जनता पार्टी एक दलित को पहले उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस और विपक्ष को जातीय जाल में फंसा दिया है. इससे कांग्रेस को एक दलित उम्मीदवार देने के बजाय कोई विकल्प नहीं बचा.

जातीय अखाड़े में लोकतंत्र लगातार पटकनियाँ खा रहा है. लोकतंत्र के लिए बहुलतावाद जरुरी है, और इसके लिए नया नजरिया बनाना होगा.

नीति निर्माण और कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी

 

इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन और यू.एन. वीमेन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार संसद और सरकार के कार्यकारी पदों पर महिलाओं की भागीदारी के लिहाज से भारत, विश्व में 148वें स्थान पर है. संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्य सभा में महिलाओं की भागीदारी क्रमशः 11.8% (64 MPs) एवं 11% (27 MPs) हैं. केन्द्रीय मंत्रीमंडल में 5 महिला मंत्रियों (18.5%) के साथ भारत विश्व में 88वें स्थान पर है (India ranks 148 in representation of women in government, The New INDIAN EXPRESS, March 17, 2017).
विश्व बैंक के अनुसार देश के कुल कार्यबल में महिला कार्यबल के आधार पर भारत 131 देशों में 120वें रैंक पर है. इस रिपोर्ट के अनुसार कार्यबल में महिलाओं के कम हिस्सेदारी की वजह यह है कि बड़ी संख्या में युवा लड़कियां स्कूलों में जा रही हैं परन्तु वे ड्राप-आउट हो जाती हैं साथ ही साथ नौकरी की अवसरों में भी कमी है. विश्व बैंक के वरिष्ठ देश अर्थशास्त्री फ्रेडरिक गिल संदर कहते हैं- ‘भारत ने 2005 से 2012 के बीच देश की व्यस्क जनसंख्या के अनुपात में केवल 0.9 प्रतिशत नौकरियां ही पैदा किया है’. भारत में (27%) चीन (65%) और ब्राजील (70%) की तुलना में कार्यबल में महिला भागीदारी काफी कम है (India ranks 120th among 131 nations in women workforce, says World Bank report, Hindustan Times, May 29, 2017).
हालाँकि, केद्रीय सरकार द्वारा लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के प्रावधान वाली महिला आरक्षण विधेयक को 2017 के शीतकालीन सत्र में संसद में पेश करने की योजना बना रही है. विदित हो कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दुसरे कार्यकाल के दौरान 2010 में राज्यसभा ने इसे पास कर दिया था (शीत सत्र में महिला आरक्षण विधेयक, बिसनेस स्टैंडर्ड, सितम्बर 20, 2017). 

मंदी का दौर बढ़ गया और अमीरों की संपत्ति भी बढ़ गया

वाह रे हमारी अर्थव्यवस्था !

हमारी अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट में पिछले कुछ महीनों से जारी गिरावट से लगभग 5 प्रतिशत पहुँच गया है. जी.एस.टी. के कारण अप्रत्यक्ष कर की उगाही पर विपरीत प्रभाव पड़ा जिस कारण पिछले वर्ष अगस्त-सितम्बर की तुलना में इस वर्ष अगस्त-सितम्बर में कर उगाही लगभग 90 हजार करोड़ रूपए रहा. हमारी अर्थव्यवस्था निरंतर घाटे में रहती है लेकिन पूंजीपति हमेशा फायदे में रहते हैं.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फोर्ब्स इंडिया मशहूर अमरीकी पत्रिका फोर्ब्स का भारतीय संस्करण है, जिसका मालिकाना हक़ भी मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस के पास ही है.

इस वर्ष फ़ोर्ब्स मैगज़ीन के अनुसार भारत के सौ सबसे आमिर लोगों की संम्पत्ति में 26 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. साल भर पहले इनकी संपत्ति 24.31 लाख करोड़ थी जो बढ़कर 31.13 लाख करोड़ रूपए हो गई है.

नोटबंदी और जीएसटी की अनिश्चितता का असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ा लेकिन अमीरों की तिजोरी पर नहीं.

इस सूची में सबसे आगे रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन मुकेश अंबानी हैं.

उनके बारे में फोर्ब्स इंडिया ने लिखा है, "तेल और गैस टाइकून मुकेश अंबानी से ज़्यादा फायदा किसी को नहीं हुआ. अपनी संपत्ति में 15.3 बिलियन डॉलर (लगभग एक लाख करोड़ रुपये) जोड़कर वह पहले स्थान पर मजबूती से बने हुए हैं."

मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति अब 38 बिलियन डॉलर यानी 2.47 लाख करोड़ रुपये हो गई है. दूसरे नंबर पर विप्रो के मालिक अज़ीम प्रेमजी हैं जिनकी संपत्ति मुकेश अंबानी से ठीक आधी यानी 19 बिलियन डॉलर (1.2 लाख करोड़ रुपये) है.

एक और मज़ेदार बात यह है कि योगी की पतंजलि के सी.ई.ओ. के संपत्ति में भी भारी वृद्धि हुई है सी.ई.ओ. आचार्य बालकृष्ण इस सूची में 19वें नम्बर पर हैं. 45 साल के बालकृष्ण शीर्ष 20 अमीरों में सबसे कम उम्र के उद्योगपति हैं. उनकी संपत्ति 6.55 बिलियन डालर हैं. सभी शीर्ष सौ अमीरों में वह चौथे नंबर के सबसे नौजवान उद्योगपति हैं. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ करीबी के लिए चर्चा में रहने वाले उद्योगपति गौतम अडानी इस सूची में 10वें नंबर पर हैं. (स्रोत: http://www.bbc.com/hindi/india-41513551)

ये सभी आमिर लोग शेयर मार्केट में अपनी कंपनियों का शेयर बेचकर धन कमाते हैं. आम लोग इनके कंपनियों का शेयर खरीदकर अपने लिए पाई-पाई जोड़ते हैं लेकिन इस क्रम में अमीरों के कंपनियों का शेयर आसमान छूता है और वे धनवान बनते हैं. बैंकों का कर्ज खा जाते हैं और उसका भरपाई भी जनता करती है. अतः हम और हमारी अर्थव्यवस्था सवालों के घेरे में हैं.

प्रधानमंत्री ने पटना विश्वविद्यालय को मुक्ति का मार्ग दिखाया

 

पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्वविद्यालय को शीर्ष तक पहुँचाने के लिए मुक्ति का मार्ग बताया. मुक्ति के लिए प्रधानमंत्री द्वारा बनाये गए मापदंड पर कोई तीसरा पक्ष विश्वविद्यालय का आकलन करेगा और उसके आधार देश के 10 निजी और 10 सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का चयन किया जायेगा. उसके बाद इन विश्वविद्यालयों के लिए दस हजार करोड़ रुपये दिया जायेगा. पता नहीं इसमें पटना विश्वविद्यालय चुना जायेगा या नहीं.

माननीय मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार ने पटना विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने की मांग की जो पटना विश्वविद्यालय की पुरानी मांग है. इसके बदले में प्रधानमंत्री ने विश्वविद्यालय को एलुमनाई जोड़ कर चलाइए. पटना विश्वविद्यालय के लिए यह पहला अवसर था जिसमें प्रधानमंत्री शामिल हुए फिर भी विश्वविद्यालय ठगा गया. संसाधन से लेकर शोध तक के लिए उन्होंने विश्वविद्यालय को ही अपने लिए उपाय खोजने की सलाह दी.

यह बड़ी विडंबना है कि दुनिया की सभी शीर्ष विश्वविद्यालयों के संचालन में सरकार की बड़ी भूमिका होती है परन्तु हमारे देश के प्रधानमंत्री यहाँ के विश्वविद्यालयों को सरकार से स्वतंत्र कर निजी पूंजी के हवाले करने की बात कर रहे हैं. जिस तरह राज्य लगातार शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के जिम्मेदारी से भागने के कोशिश कर रही है यह उसी का एक और कदम है.

समावेशी विकास में भारत पीछे

 

विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी समावेशी विकास सूचकांक में भारत पाकिस्तान से भी नीचे है. भारत इस सूचकांक में 62वें पायदान पर है जबकि हमारा पड़ोसी चीन 26वें जबकि हमारा सबसे नजदीक पड़ोसी पाकिस्तान 47वें स्थान पर है. डब्लू.ई.एफ. ने सालाना जारी होने वाले अपने सूचकांक कहा कि दुनिया का सर्वाधिक समावेशी अग्रणी अर्थव्यवस्था होने का तमगा नार्वे ने बरक़रार रखा है. पिछले साल भारत 79 विकासशील देशों में 60वें पायदान पर रहा था, जबकि चीन और पाकिस्तान 15वें और 52वें स्थान पर थे. इससे स्पष्ट है कि पिछले एक साल में एक ओर जहाँ हमारा पडोसी मुल्क पाकिस्तान समावेशी विकास में अपनी स्थिति सुधारी है तो इस मामले में हमारी स्थिति और ख़राब हुई है. गौरतलब है कि यह रिपोर्ट तब आयी है जब दावोस में माननीय प्रधानमंत्री विश्व आर्थिक मंच के बैठक में भारत में तीव्र आर्थिक विकास की चर्चा कर रहे थे.

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को तोडना फांसीवादी प्रवृति


त्रिपुरा में चुनाव नतीजा आने के तीन दिन बाद ही शहीद भगत सिंह के आदर्श साम्यवादी क्रान्ति के नायक लेनिन की मूर्ति तोड़ दी गई. इतिहास में मूर्तियाँ तोड़ी गई हैं. मूर्तियों को बनवाने के पीछे कई कारण होते है, जिसमें विचारधारा, आस्था, यादें और प्रेरणा की भावना के अलावा वर्चस्व, सत्ता और जीत के विचार होते हैं. मूर्तियों से काल, प्रगति और इतिहास का बोध होता है. यह हमारे अस्तित्व और ज्ञान-विज्ञान इससे जुड़ा है. देश और दुनियां में ऐसे धरोहर भरे पड़े है. इसे सहेजना आने वाली पीढ़ी के लिए आवश्यक होता है. मूर्तियों को तोड़ने का नजरिया इतिहास को सहेजने के बजाय नष्ट करने से है. मूर्तियों को तोडना कभी भी भारत या कहीं भी अच्छा नहीं माना गया है. राजनितिक पार्टियों के प्रोत्साहन पर मूर्तियों को तोड़ा जाता है इसकी जवाबदेही राजनितिक पार्टियों और प्रशासन दोनों की है.


इससे इंसानियत और सहिष्णुता को नजरअंदाज कर तानाशाही प्रवृति की दिशा बनती है. इतिहास को बदले की भावना से नहीं दुहराना चाहिए. आपको लोकतंत्र में एक अवसर मिला जिसके मुल्य को ही नष्ट कर रहे हैं. यही तो फासीवादी विचार है जो इंसान के अस्मिता के लिए खतरनाक है.