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हिन्दी की प्रमुख प्रवासी लेखिका सुषमबेदी लम्बे अरसे से अमेरिका में रह रही हैं। वे जानी-पहचानी लेखिका हैं। वहाँ हिन्दी में कैलीफोर्निया में प्रोफेसर रहीं है। आजकल वे हिन्दी शिक्षण से जुड़ी है, उनका प्रथम उपन्यास 'हवन’ चर्चित हुआ था। उन्होंने कर्इ उपन्यास, कहानी, लेख, कवितायें लिखी हैं। वे भारत आती रहती हैं। भारत आने पर मैंने उनसे साक्षात्कार लिया।

प्रतिभा : आप अनेक दशकों से अमेरिका में हैं। प्रखर बौद्धिकता के साथ आप उत्कृष्ट साहित्यकार भी हैं। आपके लेखों में जहाँ वैचारिकता के लिए संदर्भ और विमर्ष के नये धरातल मिलते हैं वहीं आज उपन्यासों, एक कथा-संग्रह और अनेक स्फुट कहानियों में आपकी अदभुत रचनाशीलता मिलती है। इसके अतिरिक्त भाषा-शिक्षण और विशेष रूप से हिन्दी  पर भी आपने काफी काम किया है। अनेक पुरस्कार, विदेषी भाषाओं में आपके अनुवाद, विष्वविद्यालय में प्राध्यापन इतना कार्य कैसे कर लेती हैं?

सुषमबेदी : वहाँ पर मुझे लगता है समय ज्यादा मिलता है। चौबीस घण्टे में अमेरिका का आर्इ.बी.एन. ट्रेडिशन  है कि आठ घंटे बाहर काम कीजिए। आठ घंटे दूसरे काम, घरेलू कार्य और आठ घंटे सोइए। मेरा मतलब है आठ घंटे अपने लिए, शोपिंग आदि के लिए रखती हूँ। मैं मूलत: लेखन में ज्यादा वक्त लगाती हूँ। खाना बनाने में दो घंटे से अधिक समय नहीं देती। शापिंग ज्यादा नहीं करती। लेखन के लिए समय बँधा नहीं है, नियम नहीं है। जब फुर्सत मिलती है, मूड बनता है, घटनाएँ प्रेरित करती हैं, तो एडिटिंग का काम करती हूँ, लेखन का काम करती हूँ। अमेरिका में सोशल  हस्तक्षेप  नहीं है जो चीजें यहाँ बाधक हैं, वहाँ नहीं हैं। कभी खाना बाहर खाना है तो जो समय बचता है वह मैं लेखन में लगाती हूँ। मैं सोचती हूँ मेरी इतनी उम्र हो गयी। मैंने काम कम किया है।

प्रतिभा : इतने समय से अमेरिका में रहते हुए और दुनियां के अनेक देशों में जाते रहने से आपमें वैश्विक मूल्य-चेतना, भूमण्डलीय बोध पनपा ही होगा। क्या यह वैश्विकता स्थानीयता अर्थात मूल भारतीयता को विस्मृत करती है? या उसका समावेश कर लेती है? क्या वह एक अवयव के रूप में अपनी जगह बनी रहती है?

सुषमबेदी : वैश्विकता और भारतीयता का बोध अलग-अलग बात नहीं है। निर्भर करता है प्रसंगवश कि वैश्विक  रंग से या भारतीय में दोनों में दुनियां पर दूसरी निगाह डालती हूँ। वह वैश्विकता है। मैं वहाँ रहती हूँ तो भारत को एक दूसरी निगाह से देखना शुरू करूँ तो वह भारतीयता है।

प्रतिभा : विविध अन्तर्राष्ट्रीयताओं के समाज में विवाह का ढाँचा (स्ट्रक्चर) बदलना स्वाभाविक है। अन्तर्राष्ट्रीय विवाह, अन्तर्नस्लीय विवाह, अलग-अलग जीवन शिल्प के विवाह। 'हवन में भी और अन्य उपन्यासों में भी इनकी सफलता और सुख मिलता है? 'मोरचे उपन्यास में बहुत त्रासद स्थितियां हैं।

सुषमबेदी : वहाँ विवाह ज्यादा से ज्यादा अन्तरजातीय, अन्तर्देषीय होंगे उन्हें वैसा नहीं मानना चाहिए। मैं देखती हूँ कि भारतीय अमरीकियों के विवाह ज्यादा सफल हैं। ज्यादातर हिन्दुस्तानी अन्तर्देशीय विवाह की अपेक्षा भारतीय विवाह में सफल हैं। यह अच्छी बात है। भारत में लड़की के परिवार से अपेक्षा होती है। भारत में दहेज की अपेक्षा होती है। ऐसी प्रथा यहाँ नहीं है। यहाँ अपनी मर्जी से लड़की वाला कुछ उपहार स्वरूप देता है तो ब्रिटिश लड़के वाले बहुत खुश होते हैं। वे शुक्रगुजार होते हैं। ब्रिटिश लड़के हिन्दुस्तानी लड़कियों से विवाह करते हैं तो वैवाहिक संतुलन बना रहता है। हिन्दुस्तानी  लड़कियाँ घरेलू कार्यों के अलावा बाहर के कार्य, बच्चों की परिवरिश, सभी करती हैं। ब्रिटिश  लड़के इतना सब देखकर खुश ही नहीं कृतज्ञ भी होते हैं। कभी-कभी मोहभंग भी होता है। पर अपेक्षा न होने से वैवाहिक सन्तुलन  बना रहता है।

प्रतिभा : उपन्यास 'हवन का 'सीक्वेल या 'एक्स्टेंशन कैसा लगता है। क्या आप इसे इस दृष्टि से देखती हैं? 'हवन के कुछ पात्रों का बाद जीवन इसमें आया है।

सुषमबेदी : मुझे लगा कि तनु के जीवन को मैंने 'हवन में बहुत विस्तार नहीं दिया। उसके पूरे जीवन को देखते हुए मुझे 'मोरचे में तनु के जीवन को विस्तार से दिखाना था। 'हवन मेरा पहला उपन्यास था जिसमें आसपास का घटित वातावरण, परिस्थितियां, सामाजिक-सांस्कृतिक द्वंद्व सभी आ गया था। जब ऊषा प्रियंवदा ने 'हवन पढ़ा तो कहा कि मैं इसमें से तीन उपन्यास निकाल लेती। मुझे लगा कि कुछ चीजें विस्तार से दिखाना हैं। इसलिए 'मोरचे उपन्यास लिखा। और इस तरह वह 'हवन से जुड़ा है।

प्रतिभा : 'लौटना उपन्यास के बारे में आपने कहा है कि उसकी मीरा मैं ही हूँ। मुझे लगता है कि आप अपने हर उपन्यास में कहीं न कहीं हैं। कहा भी जाता है हर उपन्यास लेखक की आत्मकथा होती है, तथ्यात्मक नही तो वैचारिक। आपकी प्रतिक्रिया!

सुषमबेदी : अपने हर उपन्यास में लेखक का बहुत कुछ अपना आ जाता है। सोच, जो देखा, घटना जो आसपास घटित हुर्इ, कुछ हद तक वह हमारी ही होती है। विचाररूप से हमारा कुछ न कुछ अंश विशेष रूप से विचारात्मक, भावात्मक अंश जो जीवन में जिया गया, जीवन का वह हिस्सा उपन्यास में आ जाता है। जैसे 'इतर में मेरा अपना अनुभव या वह मैंने लिखा।

प्रतिभा : 'लौटना के अन्त में मीरा का अपने पति विजय के पक्ष में निर्णय करना क्या सधा-सधाया सुखद अन्त नहीं लगता? प्रेमी कृष्णन के पक्ष में निर्णय करना कुछ ज्यादा ही परम्परा भंजक हो जाता क्या?

सुषमबेदी : मुझे लगा कि मीरा कितनी भी 'बोल्ड हो पर अन्तत: वह संवेदनशील है। पति के प्रति उपकार करना चाहती है। वह सोचती है यदि वह कृष्णन के साथ जाती है तो विजय ने उसके साथ कुछ गलत नहीं किया जिससे उसे सजा मिले इसलिए मैं फैंसला नहीं कर पायी कि वह चली जाए। विजय बीमार भी हो जाता है। इस कारण उसका जाना रूक जाता है जो विजय के लिए सही है।

प्रतिभा : विदेशों में भारतीयों के जीवन-संघर्ष और सांस्कृतिक द्वन्द का यथार्थ जितना आपके पहले उपन्यास 'हवन में व्यक्त है उस तरह परवर्ती उपन्यासों में नहीं, हालाँकि वह कुछ न कुछ सभी में है, कोर्इ विशेष कारण?

सुषमबेदी : 'हवन में सारी बातें कह चुकी थी। इसलिए 'रिपोर्ट नहीं करना चाहती थी। मैंने उसी तरह के संघर्ष को बाद के उपन्यास में नहीं लायी क्योंकि दोहराना अच्छी बात नहीं है।

प्रतिभा : वैसे तो आपके सभी उपन्यासों में स्त्री अपनी असिमता और मुकित के लिये संघर्ष करती है पर 'मैंने नाता तोड़ा में यह स्त्री-विमर्श अधिक है। रितु को स्त्री मुकित के लिये पषिचमी समाज अधिक उपयुक्त लगता है। क्या इससे आपकी सहमति है?

सुषमबेदी : अमेरिका में आजादी का माहौल है, भारत में सतार्इ हुर्इ लड़की के लिए कोर्इ विकल्प नहीं। अमेरिका में 'रेप इतना भयानक नहीं जितना भारत में है। भारत में मूलत: जो सिथति है वह यह कि इस तरह के अनाचार को पी जाना पड़ता है। अमेरिका में लड़की पुरुष को कटघरे में खड़ा कर सकती है। लड़की के जीवन पर असर वहाँ भी होता है पर अमेरिका में यौन शुचिता विवाह की शर्त नहीं है। वहाँ समाजों में यौन शुचिता के सवाल को तोड़ डाला है, वहाँ कुमारी से शादी करना है, यह नहीं है। वहाँ विवाह के पूर्व संबंध होते हैं पर बंधन, रूढि़याँ जो भारत में है जिनमें नारी कसी है वहाँ मुख्यधारा में नहीं हैं। कभी-कभी समस्या होती है पर वैसी असामान्य रूप से नहीं है। भारत में दाग लग जाता है नारी खोटे सिक्के की तरह मैली हो गयी, जूठी हो गयी यह माना जाता है। 'कंडमनेषन को लेकर वहाँ बुरा भला नहीं। औरत अपने बूते पर जी रही है उसकी बेहतर मुक्ति है वहाँ पर।

प्रतिभा : भारत में किशोरावस्था का कटु अनुभव औरत को बहुत तिक्त बना देता है। 'मैंने नाता तोड़ा की तनु कहती है- मैं नाता तोड़ती हूँ तो उन विश्वासों से, उन ऊल-जलूल मान्यताओं से जो औरत को उसी तरह विषाक्त, परिहार्य देखती हैं जैसे मुझे देखा गया? क्या पश्चिमी समाज में स्त्री इस तरह के दमन से मुक्त हैं?

सुषमबेदी : वहाँ मुकित तो नहीं है लेकिन उस तरह का धब्बा नहीं। आत्म ग्लानि होती है पर औरत के साथ तो सारी दुनियाँ में बुरा होता है। लेकिन जब बाप भी ऐसा व्यवहार करता है। चाचा या अन्य रिश्तेदार करते हैंतो ज्यादा कष्ट होता है। धब्बा इस आत्म ग्लानि  को चौगुना कर देता है। संबंध रिश्तेदार, पिता करता है तो तकलीफदेह होते हैं।

प्रतिभा : स्त्री के वास्तविक मुक्ति से क्या तात्पर्य है? किससे मुक्ति !

सुषमबेदी : अपने आप से मुक्ति, समाज के बंधनों के बोझ से दबे रहना, पति का ध्यान, जिम्मेदारियाँ आदि से मुä होकर सही तरह से जी पाना। जिम्मेदारियाँ जो पुरुष के लिए सही है और औरत पर लादी हुर्इ है, झूठी मान्यताओं से मुकित परन्तु उसको सारी उम्र छोड़ जाना मुषिकल है। ये तो है न!

प्रतिभा : पश्चिम में चले 'वीमेनलिब की भूमिका क्या रही? क्या उसमें अतिवादिता आ गयी?

सुषमबेदी : अतिवादिता की बात ठीक नहीं है। हर जगह अतिवादिता है। औरत संतुलन बिठा रही है और सही संतुलन बिठाने में सफल भी हुर्इ है। आजादी औरत के लिए गलत नहीं है लेकिन आजादी का गलत इस्तेमाल करने वाले भारत में भी हैं। षिक्षा, व्यवसाय, शादी करके बच्चों का पालन-पोषण, प्यार-दुलार आदि जिम्मेदारियाँ वह बखूवी निभा रही हैं। नयी पीढ़ी में अच्छा संतुलन है। नये जमाने के परिवर्तन कम्प्यूटर पर काम, घर में काम, नौकरी, बच्चों के काम औरत ने वहाँ भी निभाये हैं।

आधुनिकता का मूल्य मानव है

(सुषमबेदी से उनके दिल्ली आगमन पर साक्षात्कार)

प्रतिभा : आज पढ़ा-लिखा वर्ग भारतीयता के पाले में खड़ा होकर भारतीय समाज की सभी बुराइयों की जड़ पाश्चात्य सभ्यता के अनुकरण को मानता है। क्यों वे लोग जड़वादी हैं? कहाँ तक सही हैं यह?

सुषमबेदी : पाश्चात्य सभ्यता की नकल में यह नहीं कह सकते कि बुराइयों की जड़ वही है, जबकि कुछ चीजें हैं। भारतीयता को ठीक से समझा नहीं जाता है। आधुनिकता भारतीयता का विकास है। भारतीयता के मामले में हिन्दुत्व की बात आ जाती है। हम यह मानते हैं कि आजादी लड़कियों को देनी चाहिये; हाँ देना चाहिए। दूसरी तरफ भारतीयता वाले लोग कहते हैं कि हमारी औरत खराब हो रही हैं। आजादी ने हमारी औरत को आत्मनिर्भर बनाया है। अगर हम औरत के विकास की बात करें तो आजादी देनी चाहिये वरना समाज पिछड़ा रह जायेगा। हमारी औरत ने तरक्की की है। औरत की आजादी से समाज का विकास होगा। मनु स्मृति में कहा गया है कि औरत का स्थान घर में है, वह किसी न किसी के संरक्षण में काम करे लेकिन उसका विकास तो निडर होकर काम करने में है। घर में रह जाने में ही नहीं। भारतीयता में अंधा आग्रह गलत है। भारतीयता का विकास आधुनिकता को अपनाते जाना हमारी साफ-सहज प्रक्रिया है।

प्रतिभा : नैतिकता के मामले में भी अमेरिका सहित पषिचमी समाज के प्रति हमारे पूर्वाग्रह हैं आपकी दृषिट में नैतिकता का क्या अर्थ है?

सुषमबेदी : नैतिकता से तात्पर्य मानवीय नैतिकता है। मैं उसमें विश्वास करती हूँ किसी को चोट न पहुँचाना। धर्म भी ऐसी बात करता है। धर्म की सीमा में भी इंसानियत है। नैतिकता सही सम्मान है। व्यकित का सहज व्यवहार, नैतिकता है। धर्म ने भी अच्छी बातें कही हैं। इंसान का काम चलाओ, उसे चोट न पहुँचाओं। मानवीय सरोकार बनाए रखो। मानवीय संबंधों में संवेदनशीलता ही नैतिकता है।

प्रतिभा : आज आधुनिकता के दौर में संवेदनाएँ खत्म हो रही हैं। संबंधों में संवेदनाओं के विकास का कारण?

सुषमबेदी : आज आदमी भाग दौड़ में लगा है। वह सब कुछ पाने के लिये आतुर है। आधुनिकता ने व्यक्ति को अपने प्रति सजग बनाया है। व्यकित की जो इच्छाएँ हैं उन्हें वह पूरा करना चाहता है। वह आकाष छूना चाहता है। जब यह सब नहीं कर पाता तो अंधी दौड़ में ठोकर मारकर निकलने वाली प्रवृत्ति उसे संवेदनषील बनाती है। वह केवल अपनी इच्छा से सरोकार रखता है। आधुनिकता का मूल्य मानव है। वह अपने तक सीमित हो तो संवेदना सत्य हो जाती है। मानव अपने अधिकारों की बात करता है तो वह अपने प्रति ज्यादा सजग होता है और संवेदनहीन हो जाता है।

प्रतिभा : विदेशों में रह रहे लेखकों को जब हम प्रवासी भारतीय लेखक कहते हैं तो क्या ऐसा नहीं लगता कि हम अन्य भारतीय लेखकों से उन्हें अलग कर रहे हैं? यह भी सोच लिया जाता है कि उनके नियम विदेशी हैं उनमें भारतीय समाज अनुपसिथत है। आप क्या सोचती हैं?

सुषमबेदी : विदेशों में रह रहे लेखकों को भारतीय लेखकों से अलग मैं नहीं मानती। मैं नहीं मानती कि उन्हें उसे प्रवासी साहित्य कहा जाए। वे भी भारतीय लेखन की परम्परा में लिख रहे हैं, साहित्य की परम्परा में लिख रहे हैं, भारतीय संस्कृति में लिख रहे हैं। वह भारतीय लेखकों से अलग नहीं जा रहे हैं। मैं सोचती हूँ कि वह हिन्दी साहित्य का एकांग हैं कुछ लोगों ने अलग समाज लिया लेकिन ज्यादातर समाज वहाँ का नहीं है। वहाँ रहने वाले भारतीयों की कहानियों में यह समाज भी है। इसलिए मैं नहीं मानती कि विषय अलग है और विषय की नवीनता तो गुण होती है न? एक तरह से यह वर्गीकरण किया गया जो सुविधा के लिये है। पढ़ाने वालों की सुविधा के लिये क्या लिखा जा रहा है यह समझ में आये, छपने के लिए और सरलीकरण के लिये, समझने के लिये, कि जब सवाल उठे कि क्या लिखा जा रहा है। जैसे एक वर्गीकरण दलितों का साहित्य नाम से किया है।

प्रतिभा : इसे भारत के मुख्य हिन्दी साहित्य के साथ ही रखकर क्यों नहीं देखा जाता?

सुषमबेदी : इसलिए नहीं देखा जाता कि लोग जो अदृष्य हैं, दूर हैं उस पर बात नहीं करते। इंग्लैण्ड के लेखकों ने यह मुíा बनाया है कि हम पर बात क्यों नहीं करते, पर बहुत लोग नहीं मानते कि अच्छा साहित्य है, स्तर का है वह मानते है कि जो अच्छा है वह आ जाये। हम यह मानते है कि डेमोक्रेसी का जमाना है। हमें मुख्य धारा में जगह दी जाये हम अलग नहीं है। पर वे नहीं मानते यही तो बात है न?

प्रतिभा : इसे भारत के मुख्य हिन्दी साहित्य के साथ ही रखकर क्यों नहीं देखा जाता?

सुषमबेदी : मैं ये नहीं मानती। प्रवासी लेखन में कर्इ समस्याओं को उठाया जाता है। हमें जगह दो, तो उन्होंने कहा अपने लेखन की श्रेष्ठता बनाओ। तब कहानियाँ कमजोर थीं जब वह कह रहे थे लेकिन अब लेखक अच्छा लिख रहे हैं। कुछ बढि़या होगा तो राजेंद्र यादव के दायरे में आयेगा।

प्रतिभा : विदेशों में रह रहे भारतीयों के लेखन की वर्तमान स्थिति से आप संतुष्ट हैं? और क्या वह निरन्तर उच्चतर सिथति में आ रहा है?

सुषमबेदी : अभी और साहित्य आना चाहिये। अभी तो शैशवकाल है और दूसरी जगह मौरीशस वगैरह का साहित्य बहुत पहले का है। वह मैंने पढ़ा देखा नहीं है कि कुछ कह सकूँ।

प्रतिभा : क्या विदेशों में आपको अपने हिन्दी के पाठक मिल जाते हैं?

सुषमबेदी : हाँ, थोड़े बहुत मिल जाते हैं। कुछ संस्थाएँ बनायी गर्इ हैं। कवि सम्मेलन भी होते हैं।

प्रतिभा : आपने एक लेख लिखा था, 'अमेरिका में भी वर्णभेद है क्या यह भेद आज भी है वहाँ? अमेरिका तो लोकतंत्र और समतापरक मानवाधिकारों पर बहुत गर्व करता है। फिर ऐसी विडम्बना क्यों?

सुषमबेदी : वर्णभेद है गरीब और गरीब हो रहा है। अमीर और अधिक अमीर हो रहा है, हालांकि  ओबामा ने गरीब को ऊँचा करने की कोशिश की है पर सबको सुविधायें नहीं मिल पातीं। चिकित्सा लाभ नहीं मिलता, घर नहीं मिलता अपने ढंग से जी नहीं सकते।

प्रतिभा : नस्लवाद के संदर्भ में आप के कथासाहित्य में अनेक प्रसंग हैं क्या यह नस्लवाद जातीय समूहों में ही है या श्वेतों के पक्ष में कभी-कभी प्रशासन भी साथ हो जाता है?

सुषमबेदी : ज्यादातर नस्लवाद इस तरह का नहीं है। काले लोग भी यूनिवर्सिटी में नौकरी में हैं। छोटी नौकरियों में भी हैं पर उन्हें पृथक रूप में पृच्छल रूप से देखा जाता है। मेरे लेख 'नस्लवाद के मुखौटे में यही बताया गया है।

प्रतिभा : अमेरिका सम्पन्न देष है वहाँ सरकार बिन ब्याही माँ, वृद्धों और बेरोजगारों को आर्थिक मदद देती है फिर वहाँ भीख मांगने की स्थिति क्यों आती है? क्या सरकारी मदद में भेदभाव है?

सुषमबेदी : सरकार मदद करती है तो कंडीशन देती है कि आप नौकरी तलाश कीजिए। सरकार खाने, रहने, की मदद देती है। पर लोग गलत इस्तेमाल नशा आदि भी करते हैं।

प्रतिभा : नवाभूम, पुराभूम के प्रतीकों से आप भारत और अमेरिका दोनों के समाजों को तुलनात्मक दृषिट से देखना चाहती हैं। पुराना और नया में नया सामान्यत: अच्छा माना जाता है।

सुषमबेदी : मुझमें पुरा, नया दोनों है। पुरा भारत का नवा अमेरिका का। दो संस्कृतियों का समावेश है। 'नवाभूम की रसकथा एक प्रेमकथा है। इसलिये तुलनात्मक बनाते हुए भी इसमें पूर्वराग, मिलन, विरह की स्थितियां रखी गयी हैं। नवा, पुरा का सामंजस्य, समन्वय श्रेष्ठ रहता है। हम संस्कारों को छोड़ नहीं पाते हैं न ही अमरीकी नयी संस्कृति को पूरी तरह ग्रहण कर पाते हैं हम पुराना पूरी तरह से नहीं छोड़ पाते।

प्रतिभा : वहाँ रहने वाले भारतीय परिवार में दो तीन पीढि़याँ एक साथ रहती हैं जिनमें एक या दो पीढ़ी वहीं जन्मी होती हैं। उनकी जीवन धारणायें अलग हैं। ऐसे में काफी कठिनार्इ से गुजरना पड़ता है 'हवन की गुडडो ही अपने परिवार में यह देखती है। आपकी राय....

सुषमबेदी : पीढि़यों के संग्रह हमेशा साथ चलते हैं माँ-बाप से बच्चों की पीढ़ी आगे हैं, कर्इ गुना है, जहाँ साथ विचरना पड़ता है। वह आगे है इसलिए परिवर्तन बहुत ज्यादा है। यहाँ (भारत में) नहीं है। वहाँ बच्चे 'वैल्यू लिये हैं। वहाँ इतना नहीं है।

प्रतिभा : आपका आगामी लेखन क्या है?

सुषमबेदी : मैं एक और उपन्यास पर काम कर रही हूँ- 'काँच के पुतले। एक कविता संग्रह 'इतिहास से बातचीत, एक कहानी संग्रह जिसमें पांच कहानियाँ भी हैं।

प्रतिभा : आप एकाध दिन में ही अमेरिका वापस जा रही हैं। आपकी यात्रा के लिये और आपके लेखन (जो अन्तत: हम सबका है) के लिये शुभकामनाएँ।

सुषमबेदी : धन्यवाद! तुम्हें भी!